आस्था और संस्कृति का प्रतीक महाकुंभ और यह है पौराणिक मान्यता

महाकुंभ को भारतीय अध्यात्म का महत्वपूर्ण भाग माना गया है। यह हमारी गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है। जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु पधार अपनी भक्तिमय श्रद्धा को अर्पित करते हैं। कुंभ मेला दो शब्दों के मेल से बना है। कुंभ नाम अमृत के अमर कलश से लिया गया। मेला एक संस्कृत शब्द है। इसका मतलब है एकत्रित होना या मिलना है। ऐसे महान आध्यात्मिक महाकुंभ का 26 फरवरी को समापन है।

महाकुंभ सिर्फ एक भौतिक स्नान के रूप में नहीं बल्कि आध्यात्मिक उत्सव के रूप में देखा जाता है। जिसमें स्नान करने से सारे पाप धुलते और आत्मिक शुद्धता की प्राप्ति होती है। देश में चार कुंभ- प्रयागराज, हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में होते हैं। 12 साल के अंतराल में इसका आयोजन होता है। कुंभ मेला हर तीन साल में लगता है। 12 बार कुंभ का आयोजन होता है। इसके बाद महाकुंभ का आयोजन होता है जो 45 दिनों तक चलता है। इसमें आने वाले तीर्थ यात्रियों की बोलियां, पहनावा और खान पान भले ही अलग अलग हो लेकिन सभी का उद्देश्य सिर्फ़ एक पुण्य से भरी डुबकी लगाना होता है। मान्यतानुसार इस एक डुबकी के कारण सारे पूर्व और जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं।

कुंभ मेला समाज में शुद्धता, समानता, भाईचारा और दिव्यता की भावना को बढ़ावा देता है। वास्तव में यह सामाजिक एकता का प्रतीक है। इस एकता में सामाजिक समरसता की भावना होती है, बल्कि इसमें भारतीय संस्कृति के मूल्यों की अभिव्यक्ति समाई होती है। हम सभी एक ही ब्रह्मांड के अंग हैं और हमारी जिम्मेदारी है कि एक दूसरे का सहयोग करें और सुख दुख में भागीदार बने। महाकुंभ की सच्ची पूजा वही है जो एक दूसरे के कल्याण के लिए काम करें।

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पौराणिक प्रसंगानुसार देवताओं और राक्षसों के बीच समुद्र मंथन हुआ तो कई चीजें निकली जैसे कामधेनु गाय, भयानक विष जिससे सृष्टि का विनाश हो सकता था तब भगवान शिव ने उस विष को कंठ रखकर संसार की रक्षा की। अंत में अमृत कलश निकला। देवता और राक्षस दोनों इसे पाने के लिए झगड़ने लगे इस बीच भगवान इंद्र के बेटे जयंत ने अमृत कलश उठाया और वहां से भाग गए। राक्षसों ने जयंत का पीछा किया। 12 दिनों तक देवताओं और राक्षसों में युद्ध हुआ।

जब जयंत अमृत कलश को ले भागते रहे और इस दौरान अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी के चार स्थानों प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिरी। अतः इन स्थानों को पवित्र मान वहां कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। अब सवाल है कि यह हर 12 साल में ही क्यों होता है? शास्त्रानुसार जयंत को अमृत कलश लेकर स्वर्ग पहुंचने में 12 दिन लगे। देवताओं का एक दिन पृथ्वी के एक साल बराबर होता है। इसलिए कुंभ मेला 12 साल के अंतराल पर होता है जो आस्था संस्कृति और परंपरा का संगम है।

कुंभ का शाब्दिक अर्थ होता है घड़ा। लोक जीवन के प्रत्येक शुभ काम में कुंभ की स्थापना होती है। कलश के मुख में विष्णु, ग्रीवा में शंकर और मूल में ब्रह्मा को माना गया है। अमृत की जिजीविषा के चलते महाकुंभ के आयोजन होते हैं जिससे विविधता और लोकतंत्र मूर्तिमान होते हैं। कुंभ मेला चार प्रकार का होता है। कुंभ मेला, अर्द्ध कुंभ, पूर्ण कुंभ और महाकुंभ। प्रयागराज में होने वाला यह महाकुंभ 144 वर्षों के बाद हो रहा है।

शास्त्रों द्वारा महाकुंभ को मोक्ष प्राप्ति का अवसर भी माना गया है। यह आध्यात्मिक उन्नति का अवसर प्रदान करता है। शास्त्रानुसार महाकुंभ के दौरान पवित्र नदियों का जल अमृत बन जाता है। इसलिए इसमें डुबकी लगाने को पवित्र, पावन और पुण्य माना गया है। मान्यता है कि त्रिवेणी संगम के जल को लाने से घर में खुशियां आती हैं और नकारात्मक ऊर्जा ख़त्म होती है। जिससे मनुष्य कल्याण, सांस्कृतिक चेतना और आध्यात्मिक चिंतन को प्रबलता प्राप्त होती है। यही महाकुंभ का निहितार्थ है जो हमारी आस्था और संस्कृति का प्रतीक है।

– दर्शन सिंह मौलाली हैदराबाद

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