जयशंकर प्रसाद जी की जन्म जयंती पर विशेष : ‘कामायनी’ एक दार्शनिक महाकाव्य

30 जनवरी को जयशंकर प्रसाद जी की जन्म जयंती है। इस अवसर पर हमें महाकवि जयशंकर प्रसाद द्वारा सृजित एक दार्शनिक महाकाव्य ‘कामायनी’ की याद आती हैं। इस महाकाव्य पर “शैव दर्शन” का गहरा प्रभाव है। भगवान शिव की नगरी वाराणसी में सृजित इस दिव्य ग्रंथ पर “शिव का प्रभाव” स्वाभाविक भी है। यह ग्रंथ “आत्मा” की पहचान “शिव” या परमेश्वर के रूप में तथा जीव की पहचान मनु के रूप में करता है। इस अद्भुत कृति में जीव की “चिंता” और “मोह” से “परमानंद / सच्चिदानंद” शिवत्व तक की यात्रा का मनोहारी साहित्यिक लोकरंजन विधि से काव्यमय चित्रण है।

इस दर्शन के अनुसार यह संसार मिथ्या नहीं, बल्कि शिव की इच्छा-शक्ति का प्रकटीकरण है, और अंततः समरसता (समभाव) द्वारा अखंड आनंद (शिवत्व) की प्राप्ति ही जीवन का चरम लक्ष्य है। कामायनी महाकाव्य में प्रत्यभिज्ञा दर्शन की प्रौढ़ स्थापना हुई है। प्रश्न है, इस प्रत्यभिज्ञा का क्या अर्थ है? प्रत्यभिज्ञा का सरल अर्थ है – जीव द्वारा पुनः अपनी पहचान, स्व स्वरूप का बोध। “शैवदर्शन” मानता है कि जीवात्मा और परमात्मा (शिव) में कोई भेद नहीं है।

संसार माया है और जीव मायाभि: है और शिव मायापति। यह संसार सर्वथा झूठा या मिथ्या नहीं, बल्कि शिव की ‘स्वातंत्र्य शक्ति’ (इच्छा) का प्रकटीकरण है, जिसे ‘आनंद-सिंधु’ माना गया है। कामायनी का मुख्य प्रतिपाद्य आनंदवाद या (समरसता) की स्थापना है। इस स्थापना प्रक्रिया में अंतःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) की मुख्य भूमिका है।

वस्तुत: मन ही मनु है, जीव का वह मन संकल्प विकल्प में दोलित हो रहा है। यह मन ही है जो कभी मनु को श्रद्धा रूप में, केवल वासना में और कभी भोग में न फंसकर हृदय और बुद्धि (इड़ा) के संतुलन (समरसता) की ओर ले जाती है। मनु यहां जगत के खण्ड प्रलय से दुखी और भावी भविष्य के प्रति चिंतित जीव है। वह “अन्मयमय कोश”, “प्राणमयकोश”, “मनोमयकोश का प्रतिनिधि है जो वासनाओं के कारण दुखी है। उसके जीवन में एक आशा बनकर श्रद्धा का प्रवेश होता है, यह श्रद्धा: मन का हृदय पक्ष, भाव पक्ष है। हृदय (ईश्वर की इच्छा/चिति शक्ति) का प्रतीक, जो प्रेम और विश्वास का संचार करती है। अंतःकरण में एक अवयव बुद्धि है। यह बुद्धि ही ईड़ा (तर्क) का प्रतीक, जो वैज्ञानिक प्रगति का प्रतिनिधित्व करती है।

प्रसाद जी ने इस महाकाव्य में ‘चिंता सर्ग’ से ‘आनंद सर्ग’ तक की यात्रा के माध्यम से दिखाया है कि हृदय और बुद्धि (श्रद्धा और इड़ा) के समन्वय से ही जीवन के दुखों (प्रलय) पर विजय पाकर परम आनंद (आनंदवाद) प्राप्त किया जा सकता है। मनु (जीव) का अपनी पहचान (स्व-स्वरूप) को भूलकर दुखी होना और अंत में उसे पुनः प्राप्त करना ही कामायनी का मूल संदेश है।

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कामायनी का प्रतिपाद्य:

प्रसाद जी ने सुख-दुःख, जड़-चेतन, ज्ञान-कर्म और भोग-त्याग के बीच समन्वय (समरसता) स्थापित करने पर बल दिया है, न कि किसी एक को त्यागने पर। और यह बल साहित्य को छायावादी शैली में हुआ है। अब प्रश्न है, छायावाद क्या है? इसका जब पुरुष और प्रकृति की छाया सृष्टि पर पड़े और उसका काव्यमय चित्रण साहित्य में हो तो वह काव्यमय शैली “छायावाद” कहलाती हैं। इस शैली में हृदय और बुद्धि दोनों का अद्भुत समन्वय: है। मनु जब इड़ा (बुद्धि) के पीछे भागते हैं तो दुखी होते हैं, लेकिन जब श्रद्धा (हृदय/प्रेम) के समरसता संदेश को अपनाते हैं, तब आनंद प्राप्त करते हैं।

मानवता का विकास:

मानव मन की यही दुविधा, यही द्वंद्व है। यह महाकाव्य पौराणिक मनु की कथा के माध्यम से मानव सभ्यता के आदिकालीन संघर्ष से लेकर सांस्कृतिक विकास की मनोवैज्ञानिक गाथा है।

युगीन समस्याएं:

कामायनी केवल अतीत की गाथा नहीं, बल्कि आधुनिक मानव की वासना, निराशा और अहम की समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करती है। पुरुष और नारी का द्वंद्व और प्रेम का एक नैसर्गिक रूप है। उसमें द्वंद्व मिटने के लिए प्रेम को प्रगाढ़ करना पड़ता है। समझौता और संधियां, सामंजस्य करना पड़ता है। इसमें भी ताहि कार्य किया गया है –

“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास रजत नग पगतल में। पीयूष-स्रोत बहा करो / जीवन के सुंदर समतल में”।।

देवों की विजय, दानवों की
हारों का होता युद्ध रहा।
संघर्ष सदा उर-अंतर में
जीवित रह नित्य-विरुद्ध रहा”।

“आँसू से भींगे अंचल पर
मन का सब कुछ रखना होगा।
तुमको अपनी स्मित रेखा से
यह संधिपत्र लिखना होगा।।”

जीवन में श्रद्धा का महत्व:

कवि ने श्रद्धा को विश्वास, प्रेम और समर्पण का प्रतीक मानकर, मानवता की रक्षा के लिए उसे सर्वोच्च बताया है। बुद्धि पर अतिशय विश्वास और झुकाव जीवन में संघर्ष लाता है। बुद्धि और हृदय पक्ष में एक समन्वय होना चाहिए। श्रद्धा ही मंजिल तक पहुंचाती है।

संक्षेप में, ‘कामायनी’ का प्रतिपाद्य स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रेम और सामरस्य के द्वारा जीव को अपने स्वस्वरूप का बोध होता है। उसका मूल स्वरूप द्वंद्व और संघर्ष नहीं, प्रेम है, सौहार्द्र है, ‘आनंद’, है, परमानंद, अखंडानंद है। यही दार्शनिक शैली, शब्दावली में सच्चिदानंद, शिवत्व की प्राप्ति है। शिवत्व ही जीव का मूल स्वरूप है।

आइए पहले संक्षिप्त में देखते हैं कामायनी की इस कथा को। कामायनी 15 सर्गों में विभाजित है। इन सर्गों का नामकरण मनुष्य के मनोभावों के आधार पर किया गया है। पहला सर्ग चिंता सर्ग है, इसमें बताया गया है कि देव सभ्यता विलासिता की अति के फलस्वरूप जल-प्रलय के कारण नष्ट हो गई है और मनु अकेले बचे हैं। अतः चिंतित है। इसके बाद आशा, श्रद्धा, काम,वासना और लज्जा सर्ग है। इन सर्गों में मुख्यतः मनु की गंधर्व देश की कन्या श्रद्धा से मुलाकात और इनके बीच संयोग-शृंगार का विस्तृत वर्णन है। इसके बाद कर्म और ईष्या सर्ग में मनु हिंसा की तरफ उन्मुख होता है।

अगला सर्ग है – इड़ा सर्ग। इसमें मनु की मुलाकात इड़ा से होती है, जो कि तार्किक बुद्धि से सम्पन्न नारी है। इसके बाद स्वप्न सर्ग में श्रद्धा के विरह को और संघर्ष सर्ग में मनु द्वारा इड़ा पर जबदस्ती अधिकार प्राप्त की चेष्टा के कारण मनु और इड़ा की प्रजा में संघर्ष को दिखाया गया है। इसके बाद निर्वेद और दर्शन सर्ग में श्रद्धा और मनु का पुनर्मिलन हुआ है। तत्पश्चात रहस्य सर्ग में जीवन की विषमता और उसके समाधान पक्ष को बताया गया है। अंतिम सर्ग आनंद सर्ग है, जिसमें मनु की सभी विषमताएँ समाप्त हो गई हैं और मनु आनंदवाद की स्थिति में पहुँच चुके हैं।

यदि बात करें कामायनी में निहित दर्शन की तो हम पाते हैं कि प्रसाद ने इसमें अनेक भारतीय और पश्चिमी दर्शनों का संश्लेषण किया है, यही कारण है कि इसे ‘छायावाद के उपनिषद’ की संज्ञा से भी सुशोभित किया गया है क्योंकि इसमें भी उपनिषदों की भांति तत्त्व के सगुण और निर्गुण रूप में उसके एकत्व की स्थापना की गई है। देखिए कैसे – “नीचे जल था, ऊपर हिम था, एक तरल था एक सघन। एक तत्व की ही प्रधानता, कहो उसे जड़ या चेतन।।” इसमें निहित मूल दर्शन है – प्रत्यभिज्ञा दर्शन है, आइए पहले संक्षिप्त में देखते प्रत्यभिज्ञा दर्शन को। इसके बाद विश्लेषण करेंगे कि किन स्तरों पर कामायनी में प्रत्यभिज्ञा दर्शन उपस्थित है। प्रत्यभिज्ञा दर्शन एक शैव दर्शन है, जिसकी शुरुआत कश्मीर से नवीं शताब्दी के आस-पास मानी जाती है।

सरल शब्दों में कहें तो प्रत्यभिज्ञा का अर्थ है – पहले से देखे हुए को पहचानना या फिर से जानना। एक एकत्व को पहचानना, जल और हिम में एकत्व का दर्शन। इस दर्शन के अनुसार जीव पहले शिव था लेकिन कंचुक (मल) के आवरण के कारण जीव अपनी पहचान से दूर रहता है। जीव द्वारा अपने स्वरूप को पुनः पहचान कर शिवत्व की प्राप्ति करना ही प्रत्यभिज्ञा है। इस दर्शन के अनुसार विश्व मिथ्या न होकर यथार्थ है और यह शिव की इच्छा की अभिव्यक्ति है। विश्व कोई नई रचना नहीं है बल्कि पहले से ही विद्यमान वस्तु का प्रकटीकरण है। इस दर्शन में शिव को स्वतंत्र सत्ता माना गया है और इसके पाँच कृत्य बताए गए हैं – सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह। सृष्टि का निर्माण शिव से ही हुआ है और अन्ततः यह शिव में ही विलीन हो जाती है।

ज्ञातव्य है कि जब जीव अपने आप को पुनः पहचान लेता है तो शिव और जीव में भेद समाप्त हो जाता है और आनंद, अखंडानंद, सच्चिदानंद की स्थिति उत्पन्न होती है। अंततः इस आनंद की स्थिति में समरसता की प्राप्ति होती है। समरसता का सामान्य अर्थ यह है कि इस स्थिति में सभी द्वंद्व समाप्त हो जाते हैं और आत्मा परमात्मा को प्राप्त होकर एक रूप हो जाती है। यही “रसों वै स:” की स्थिति है।

उल्लेखनीय है कि समरसता की अवस्था तक पहुँचने में जीव को पाँच कोशों क्रमशः अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोश से गुजरना पड़ता ही तब आनंद, परमानंद की उपलब्धि होती है। यह विवरण प्रत्यभिज्ञा दर्शन के सैद्धांतिक पक्ष का है। अब आइए देखते हैं इस दर्शन के व्यावहारिक रूप को जो कामायनी में वर्णित है। कामायनी का पहला सर्ग “चिंता” सर्ग है और अंतिम सर्ग है “आनंद”। अतः कामायनी की कथा चिंता से समरसता या आनंद तक पहुँचने का मार्ग दिखाती है। सर्वप्रथम देखते हैं कि समरसता का अभाव क्यों है? प्रसाद के अनुसार इसका कारण है विषमता। विषमता की स्थिति में जीवन दुखमय, चिंतामय और अवसादयुक्त रहता है और अभिशाप के समान प्रतीत होता है। यह विषमता क्यों है? प्रसाद जी के अनुसार विषमता का मूल कारण है – ज्ञान, इच्छा और क्रिया में समन्वय का सर्वथा अभाव। “ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है / इच्छा क्यों पूरी हो मन की। एक दूसरे से मिल न सकें, / यह विडंबना है जीवन की।।”

लेकिन साथ ही जीवन को गतिशील बनाए रखने के लिए विषमता आवश्यक भी है क्योंकि सुख के महत्त्व को समझने के लिए दुख से गुज़रना भी जरूरी है। प्रसाद लिखते हैं – जिसे तुम समझ रहे हो अभिशाप / जगत की ज्वालाओं का मूल। ईश का यह रहस्य वरदान / कभी मत जाओ इसको भूल।।”

प्रसाद के अनुसार विषमता को दूर करने के लिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में समरसता आवश्यक है। कोरी भावुकता और कोरी बौद्धिकता से समरसता संभव नहीं है। बताते चलें कि कामायनी की ‘श्रद्धा’ भावुकता का प्रतीक है और ‘इड़ा’ बौद्धिकता का। मनु जब श्रद्धा के साथ रहता है तो उसमें तार्किकता का अभाव है और जब इड़ा के साथ रहता है तो वहाँ भावुकता का अभाव है। कामायनी में इन दोनों में समन्वय दिखाया गया है। श्रद्धा अपने पुत्र ‘मानव’ को इड़ा को सौंप देती है, जिससे ‘मानव’ में भावुकता के साथ ही तार्किकता का भी विकास हो सके और उसमें एक संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण हो सके।

कामायनी के अंतिम सर्ग आनन्द सर्ग में प्रसाद जी ने यह बताने का प्रयास किया है कि आनंद की अवस्था तक कैसे पहुँचा जाए। प्रसाद के अनुसार आंतरिक समन्वय के माध्यम से विषमता की समाप्ति की जा सकती है और आनंद या समरसता स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है। मनु श्रद्धा की सहायता से आंतरिक मनोविकारों से लड़ते हुए आन्तरिक समन्वय के माध्यम से आनंद को प्राप्त करता है। इसी आंतरिक समन्वय से समरसता की स्थिति प्राप्त हुई है। इस संबंध में प्रसाद लिखते हैं –

“समरस थे जड़ या चेतन
सुंदर साकार बना था।
*चेतनता एक विलसती,
आनंद अखंड घना था॥”

यदि कामायनी में जगत की स्थिति की बात करें तो प्रसाद जी ने स्पष्ट लिखा है कि, “काम मंगल से मंडित श्रेय / सर्ग इच्छा का है परिणाम।।”

इस जगत में सुख-दुःख और विषमताएँ ईश्वर का रहस्यमय वरदान हैं। शिव (महाचिति) सत्य है। जगत महाचिति की ही अभिव्यक्ति है। अतः जगत भी सत्य है –

“अपने दुख-सुख से पुलकित
यह मूर्त विश्व सचराचर
‘चिति’ का विराट वपु मंगल
यह सत्य सतत चिर सुंदर।।”

प्रसाद जी ने साथ ही यह भी लिखा है कि महाचिति लीलामय और मंगलमय है, इसलिए जगत भी मंगलमय है –

“कर रही लीलामय आनन्द
महाचिति सजग हुई सी व्यक्त।
विश्व का उन्मीलन अभिराम
इसी में सब होते अनुरक्त।।”

इसमें मनुष्य की मूल समस्या ‘विषमता’ है और इस समस्या का समाधान यह है कि मनुष्य ‘समरसता’ की स्थिति में पहुँचे। कामायनी की प्रासंगिकता प्रसाद के इन शब्दों में निहित है कि यदि विश्व के सभी मनुष्य समरसता अपना लें तो यहाँ कोई पापी नहीं होगा, कोई किसी की सेवा को पराई नहीं समझेगा और जीवन वसुधा समतल हो जाएगी – शापित ना यहाँ है कोई, तापित पापी नहीं यहाँ है।

‘कामायनी’ जयशंकर प्रसाद जी के गहन चिंतन एवं मनन का परिणाम है। इसमें मनु, श्रद्धा और इड़ा की कथा है, लेकिन सूक्ष्म रूप से यह कथा मानव जीवन के अनेक मनोवैज्ञानिक पहलुओं को लिए मानव विकास की कथा हो गई है। इसमें मनु ‘मन’के, श्रद्धा ‘हृदय’की और इड़ा ‘बुद्धि’ की प्रतीक है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया के सामंजस्य द्वारा ही आनन्द की प्राप्ति होती है। कामायनी के नायक (मनु) का चरम प्राप्य है – “आनन्द” तथा कामायनी का मूल प्रतिपाद्य विषय हुआ “आनन्दवाद”। कामायनी में जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित एक महाकाव्य है, जिसकी रचना उन्होंने 1936 में की थी तथा इसका प्रकाशन भी उसी वर्ष 1936 में ही हुआ था। कामायनी, पंद्रह सर्गों में वर्गीकृत है – 1. चिंतन, 2. आशा, 3. श्रद्धा, 4. काम, 5. वासना, 6. लज्जा, 7. कर्म, 8. ईर्ष्या, 9. इड़ा, 10. स्वप्न, 11. संघर्ष, 12. निर्वेद, 13. दर्शन, 14. रहस्य और 15. आनंद।

अब यदि सारांश की बात की जाये तो इस महाकाव्य की शुरुआत होती है देव संस्कृति के विनाश से जो कि पृथ्वी के जलमग्न होने से होती है। इसमें केवल मनु ही जीवित बचे हैं, तद्पश्चात मानव जाति का विकास होता है जिसके मूल में चिंता है जो की मृत्यु और वृद्धावस्था का कारण बनती है। एक दिन काम की पुत्री श्रद्धा, मनु के पास आती है और दोनों साथ रहने लगते हैं।

कामायनी’ का क्या सार है?

कामायनी मन से हृदय और बुद्धि तक की यात्रा है। इसमें मनु मन का, श्रद्धा हृदय का और इड़ा बुद्धि का प्रतीक है। इनके माध्यम से मनु के द्ववारा श्रद्धा के सहयोग से सृष्टि की उत्पत्ति और इड़ा के द्वारा उन्नति के चरमोत्कर्ष पर पहुँचकर अंततः पतन के पश्चात पुनः श्रद्धा के शरण में शांति है और जहां प्रशांति है वहीं परमानंद की प्राप्ति होती है। यही जीव का परम पुरुषार्थ है।

डॉ. जयप्रकाश तिवारी (94533 91020)
बलिया, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

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