हैदराबाद: रक्षा मंत्रालय के उपक्रम मिश्र धातु निगम लिमिटेड (मिधानि) में राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के दिशा-निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करते हुए 13 अगस्त को हिंदी कार्यशालाओं की श्रृंखला में चौथी मासिक एक दिवसीय हिंदी कार्यशाला संपन्न हुई। यह हिंदी कार्यशाला मिधानि की राजभाषा कार्यान्वयन समिति के तत्वावधान में आयोजित की गई।
प्रारंभ में उद्यम के प्रबंधक (हिंदी अनुभाग एवं निगम संचार) डॉ बी बालाजी ने प्रतिभागियों का हिंदी कार्यशाला में स्वागत किया। अपने संबोधन में उन्होंने कार्यशाला के आयोजन का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए बताया कि कार्यालय के दैनिक कार्यों में हिंदी के उपयोग में आने वाली कठिनाइयों को दूर करने, सरल और व्यावहारिक तरीकों पर विचार-विमर्श करने तथा उपयोगकर्ताओं की झिझक समाप्त करने के उद्देश्य से हिंदी कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि इन कार्यक्रमों में मानक हिंदी लिपि, व्यावहारिक व्याकरण, प्रशासनिक और तकनीकी शब्दावली का प्रयोग, व्यावहारिक अनुवाद, आलेखन एवं टिप्पण, राजभाषा नीति जैसे महत्वपूर्ण विषय सम्मिलित हों।
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उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे कार्यशाला के विभिन्न सत्रों का भरपूर लाभ लें और राजभाषा से संबंधित कार्यान्वयन में प्रबंधन की अपेक्षाओं तथा आवश्यकताओं को पूर्ण करने का प्रयास करें। “राजभाषा नीति और उसमें कर्मचारियों की भूमिका” विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए उन्होंने राजभाषा नीति से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों, राजभाषा अधिनियम, 1963 तथा राजभाषा नियम, 1976 की जानकारी प्रदान की। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र सरकार द्वारा कार्यालयों में राजभाषा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु क्या-क्या प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने प्रतिभागियों को राजभाषा से जुड़े लक्ष्यों की जानकारी दी और हिंदी में कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

प्रथम सत्र में डॉ. एस. रवि चंद्र, सहायक निदेशक, हिंदी शिक्षण योजना, राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार ने “भाषा–संप्रेषण का प्रभावशाली साधन” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि वक्ता और श्रोता के बीच संभाषण तभी सफल माना जाएगा जब वक्ता द्वारा कही गई बात या दी गई सूचना अपेक्षित अर्थ में श्रोता तक पहुँचे। इसके लिए वक्ता को चाहिए कि वह श्रोता को समझ में आने वाली भाषा में बात करे, परिचित उदाहरणों द्वारा समझाए तथा संभाषण के दौरान उचित और स्वागतयोग्य शब्दावली का प्रयोग करे। शब्द चयन तथा आवाज के आरोह–अवरोह से शब्दों के अर्थ संदर्भानुसार अभिधा, व्यंजना और लक्षणा में परिवर्तित होते रहते हैं।
हिंदी और तेलुगु दोनों भाषाएँ भारतीय भाषिक परंपरा की समृद्ध धरोहर हैं। यद्यपि हिंदी आर्यभाषा परिवार से और तेलुगु द्रविड़ भाषा परिवार से संबंधित है, फिर भी दोनों में कई सामान्य शब्द, भाव और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव दिखाई देते हैं। हिंदी और तेलुगु में पारस्परिक अनुवाद से भाषायी समन्वय को बढ़ावा दिया जा सकता है। कार्यालयीन हिंदी का व्याकरण सरल, स्पष्ट और नियमबद्ध है, जिससे प्रशासनिक कार्य में एकरूपता आती है। प्रशासनिक शब्दावली में प्रयुक्त मानकीकृत शब्द जैसे प्रस्तावना, आदेश, सूचना, अनुमोदन आदि से कार्यपत्रों की भाषा औपचारिक और प्रभावी
बनती है।

कार्यालयीन कामकाज में प्रयुक्त प्रशासनिक शब्दावली और संक्षिप्त नेमी टिप्पणियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि प्रशासनिक शब्दावली के निर्माण तथा उसके अनुप्रयोग के विभिन्न संदर्भों से प्रतिभागियों को परिचित कराया गया। साथ ही, उन्होंने कार्यालयीन भाषा की शब्दावली के प्रयोग का अभ्यास भी कराया। कार्यशाला के सफल आयोजन में हिंदी विभाग की श्रीमती डी. वी. रत्नाकुमारी, कनिष्ठ कार्यपालक (एनयूएस), श्री विकास
कुमार आज़ाद और डाक अनुभाग के कर्मी श्री जयपाल का सक्रिय सहयोग रहा। कार्यशाला का समापन प्रतिभागियों द्वारा राजभाषा में कार्य करने की शपथ के साथ हुआ।
