‘सा विद्या विमुक्त्ये’ यह केवल एक वाक्य संरचना, केवल एक श्लोक या केवल एक डायलॉग नहीं है। यह श्लोक मानव जीवन को सार्थकता प्रदान करनेवाला मूलभूत सिद्धान्त है। जो व्यक्ति पढ़ा-लिखा नहीं है, वह मनुष्य नहीं या उसमें बुद्धि नहीं जैसे यह सोच रखना गलत है। ठीक वैसे ही शिक्षा मनुष्य को चेतनता, सजगता, दायित्वशील, सत्यनिष्ठ, पुरुषार्थ प्रेमी बनाता है इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता है।
इसी कारण से माता-पिता के बाद गुरु, शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व बढ़ जाता है, क्योंकि वे भविष्य के कर्णधारों का चरित्र निर्माण करते हैं। वर्तमान पीढ़ी वैज्ञानिक, तकनीकी, शैक्षणिक आदि सभी क्षेत्रों में विकास के चरमोत्कर्ष पर है। माता-पिता करोड़ों खर्च करके बच्चों को आज शिक्षित कर रहे हैं। सामर्थ्य न रहने पर घर-जमीन बेचकर अपने बच्चों को उच्च शिक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। फिर आज का विद्यार्थी वर्ग, युवा पीढ़ी, समस्त मानव जाति मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर इतना असंयमित, अनुशासनहीन, उत्शृंखल क्यों है? साथ ही चिंतित करनेवाली बात यह भी है कि शिक्षण संस्थानों तथा शिक्षकों का रवैया इतना ढुलमुल क्यों है?
अगर एक राज्य विशेष को कुछ देर के लिए अनदेखा कर भी दिया जाए तो भी सम्पूर्ण देश में, विश्व में आज सबसे अधिक दुर्घटनाओं का शिकार, अपराधों का शिकार तथा आपराधिक कार्यों में लिप्त विद्यार्थी वर्ग है। यह देखकर क्या वास्तव में शिक्षकों का मन कचोटता नहीं है? या फिर वह इसलिए मूक है क्योंकि उसके पास उसकी छड़ी नहीं है और अगर वह अपने संतान समान विद्यार्थी को सुधारने के लिए हाथ में छड़ी उठाएगा तो मानवाधिकार का प्रश्न उसके सामने आयेगा कि कैसे उसने किसी विद्यार्थी को डांट दिया, प्रेम से ही सही लेकिन मारा तो कैसे? ऐसे प्रश्न उठानेवाले वही अभिभावक वर्ग है जो यह भी चाहता है कि उसके बच्चे की संपूर्ण सुरक्षा का दायित्व उसकी अनुपस्थिति में शिक्षक उठाए।
विद्यार्थी जीवन वह जीवन है जब विद्यार्थी रूपी बालक और बालिका शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक परिवर्तनों से गुजरता हुआ देश, समाज, परिवार का कर्णधार बनने के लिए स्वयं को तैयार करता है। इस तैयारी में किताबी ज्ञान से लेकर, सहपाठियों का प्रेम, शिक्षकों से मिलनेवाला वात्सल्य, परिवार से मिलनेवाली आर्थिक सहायता आदि सब कुछ उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है। विद्यार्थियों के लिए एक प्राचीन भारत में या विश्व इतिहास में अलग-अलग व्यवस्थाएं प्रचलित थीं। ‘ब्रम्ह्चर्य पालन’ भारतीय गुरुकुलों की विशेष पहचान थी। आज अवश्य ही परिस्थितियाँ बदली है। सह शिक्षा, उच्च शिक्षा के दौर में विद्यार्थियों से ‘ब्रम्ह्चर्य पालन’ करवाने के बारे में सोचना अवश्य ही तर्कसंगत सिद्धान्त नहीं है। विवाह की आयु सीमा वैज्ञानिक, आर्थिक, सामाजिक परिवर्तनों के कारण से अब कठोरता के साथ तय नहीं है।
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ऐसे में दो विपरीत लिंगी सहपाठियों का भावनात्मक, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक आकर्षण के कारण से एक-दूसरे के सामीप्य को मित्रता, वासना, प्रेम इन कारणों से स्वीकार कर लेना एक स्वाभाविक बात हो गई है। हम चाहकर भी इस सत्य को नकार नहीं सकते या फिर ये कहें कि हमें नकारना नहीं चाहिए। हम नकारने का नाटक कर रहे हैं इसी कारण से विशेष रूप से विद्यार्थी वर्ग दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं। स्वयं भी आपराधिक कार्यों के साथ लिप्त हो रहे हैं। वह दलदल में हर दूसरे-तीसरे दिन फँस रहा है और हम अभिभावक वर्ग, शिक्षक वर्ग लाचार अपने बच्चों को छटपटाते हुए देखने के बाद भी उनकी रक्षा नहीं कर पा रहे हैं।
हमारी आँखों के सामने हमारी युवा पीढ़ी शिक्षा से तो दूर हो ही रही है। साथ ही सभ्यता की पहली पायदान से भी फिसल चुकी है। उसे आज किसी भी अवस्था में कहीं भी नग्न होने में संकोच नहीं है, असंयमित होने में, वाचाल होने में संकोच नहीं है। सबसे दुखद बात यह है कि एक तरफ इन बच्चों की बरबादी को राजनैतिक मुद्दा बनाकर चुनावी रोटी पकाने का प्रयास लगातार हो रहा है। तो दूसरी तरफ मीडिया इन बच्चों की बरबादी को TRP बढ़ानेवाली कहानी के रूप में उपयोग कर रही है।
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डॉ सुपर्णा मुखर्जी
हैदराबाद
