नोट- इन लेखों पर पाठकों की प्रतिक्रिया अपेक्षित हैं-संपादक।
प्रस्तुत आलेख में आदरणीय भक्तराम जी (चेयरमैन पंडित गंगाराम स्मारक मंच) ने एक सामाजिक बुराई के रूप में लगातार फ़ैल रहे “स्वतंत्र सेक्स”, “लिव इन रिलेशनशिप” तथा “उन्मुक्त जीवन” को लेकर कुछ सामाजिक प्रश्न उठाए हैं और ये प्रश्न उठने भी चाहिए। जो व्यक्ति संयमित और मर्यादित जीवन का पक्षधर होगी, एक आदर्श समाज की स्थापना, उसके उच्च आदर्श और नैतिक मापदंड, उच्चतर मानवीय मूल्यों का पोषक होगा, इस बढ़ती कुत्सित प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाए बिना नहीं रह सकता। इस लेख में यही छटपटाहट और इसकी विकृतियों को बताकर इससे बाहर निकलने का मार्ग ढूंढता एक समाज प्रहरी की चिंता, आक्रोश, गुस्सा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों पर आस्था को एक ही साथ रेखंकित करता है। हमे इस प्रवृत्ति की पृष्ठभूमि और प्रसरण के कारणों को ढूंढना होगा। आइए कुछ पड़ताल का प्रयास करते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
स्त्री विमर्श और उसके सेक्सुअल अधिकारों के नाम पर पाश्चत्य देशों में पिछले 8-9 दशकों में काफी कुछ विष-वमन हो चुका है, ‘विष-वमन’ उन्हें इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि उनमें प्रायः एकांगी आक्रोश है, विद्रोह है और सामाजिक व्यवस्था को धराशायी करने का प्रबल आह्वान भी है। यूरोप में सिमोन दि बाउवा की पुस्तक ‘दि सेकण्ड सेक्स’ और अमरीका में बेट्टी फ्रीडन की पुस्तक ‘दि फेमिनिन मिस्टिक’ ने नारी अस्तित्व को पुरुष के साथ सह-अस्तित्व की अवधारणा से अलग एक स्वतंत्र निकाय के रूप में देखने और प्रचारित करने का प्रयास किया। इस आन्दोलन की प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय चेयरपर्सन चुनी गयी अस्तित्ववादी चिन्तक सिमोन दि बाउवा। सिमोन ने दो काम किया – पहला, नारी को पुरुष से अलग कर दिया और नाम दिया ‘अन्या’ और दूसरा काम यह किया कि विवाह नमक संस्था को अनावश्यक घोषित कर डाला तथा नारी स्वतंत्रता के नाम पर मुक्त-सेक्स की मांग कर डाली। गर्भस्थ शिशु को जन्म देने, न देने का पूर्ण अधिकार उसका अपना होगा और बच्चों के पालन का दायित्व सरकार का होगा। यह चिंतन का एकांगी अतिरेक था और विकृत भी। विकृत इसलिए कि बिना विवाह के गर्भस्थ शिशु जब दुनिया में आएगा तो उसका रिश्ता-नाता किसी स्त्री या पुरुष से क्या होगा? क्या विवाह के अभाव में भावी समाज एक पशु-समाज नहीं बन जाएगा? और दूसरा विकल्प, कोई गर्भस्थ शिशु जब पैदा ही नहीं होगा तो क्या धरती पर मानव प्रजाति का विलोपन नहीं हो जायेगा? फिर कैसी सरकार और किसका पालन-पोषण?
अभिमानपूर्ण नित्यप्रति के झगड़ों से तंग
इस प्रकार दोनों ही बिन्दुओं पर वह अस्वीकार्य था। प्रख्यात चिन्तक और नोबल पुरस्कार विजेता ज्यांपाल सार्त्र ने बिना विवाह सिमोन के साथ एक छत के नीचे दम्पति की तरह कुछ वर्ष व्यतीत किया, परन्तु मतभेद के कारण अलग हो गए और सिमोन का आन्दोलन भी कमजोर पड़ गया। दूसरी और अमरिका में बेट्टी फ्रीडन के चिंतन में भी व्यापक बदलाव आया। अपने बाद के अनुभवों को उन्होंने इस प्रकार लिखा– “मैं नारी आन्दोलन के अभिमानपूर्ण नित्यप्रति के झगड़ों से तंग आ चुकी हूँ,.. शेषकाल अब मैं अपना जीवन जीना चाहती हूँ… जिस बराबरी के लिए हम लड़े, वैसा जीवन जीने में कुछ गड़बड़ लगता है, कुछ धुंधला प्रतीत हो रहा है, इसमें कुछ गलत हो रहा है… मैं पीड़ा और घबराहट के स्वर सुनने लगी हूँ…” ८० के दशक में डायना शा जैसी प्रखर महिलाओं ने ‘नारी मुक्ति-समर्थकों’ की आलोचना की। उनका कहना था– “समकालीन नारी-आन्दोलन ने हमें उन मूल्यों को तिरस्कृत करना सिखाया है जो परंपरागत रूप से स्त्री जाति के साथ जुड़े हुए हैं। यह नारी मुक्ति आन्दोलन नहीं है, इससे मैं थक गयी हूँ… यह तो नारी मुक्ति का लेबल है..”। बाद का सारा विमर्श प्रायः इसी त्रिकोण के बीच दोलायमान रहा है, चाहे वह पाश्चात्य देशों में हो अथवा हमारे देश में। अधिकार के रूप में स्वतंत्र सेक्स की मांग करने वालों ने इसके दुष्परिणामों को, अपने अनुभवों को भी बताया किंतु अब उनकी सुनता कोई नहीं। उन्मुक्तता की यह दूषित हवा अब रुकने का नाम नहीं ले रही।
संबंधित लेख-
दार्शनिक पृष्ठभूमि:
पाश्चात्य देशों में नारी समानता का आन्दोलन तीव्र गति से उठा, क्यों उठा इतने आक्रोशित रूप में? इसका कारण है एक ‘दार्शनिक मिथ’। वह मिथ यह है कि आदिम स्त्री (हौवा–इव) की उत्पत्ति आदिम पुरुष की एक पसली से हुई थी। सिमोन ने इसे जंघे की पसली कहा है। उस पसली के अलग हो जाने से पुरुष कम नहीं हुआ, परन्तु स्त्री तो एक छुद्र अंग ही बनी रही। वह दीन-हीन बनी रही और पुरुष दम्भी बना रहा। पुरुष के अंतर्मन में वही ‘श्रेष्ठता’ और नारी मन में वही ‘हीनता’ का भाव कायम रहा। अब नारी बड़ल्ला ले रही है, पुरुषों को उत्तेजित कर अपने मायाजाल दिखाकर, खुला अंगप्रदर्शन कर, अपनी आगोश में उस बांधकर, उसकी संपत्ति हड़पकर।
भारतीय चिंतन में असमानता वाला मिथ नहीं
लेकिन भारतीय चिंतन में असमानता वाला मिथ नहीं है। उपनिषद स्पष्ट कहते है कि सृष्टि के प्रारंभ में पुरुष (ब्रह्म) अकेला था। उसने अपना सामान रूप से द्विधा विभाजन किया, दाल के दो फांक की तरह एकदम बराबर-बराबर। वृह.उप.(१.४.३) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस प्रकार इसकी व्याख्या की है –“दिव्य पुरुष ने अपने ही शरीर के दो भाग किया, उससे पति और पत्नी हुए जैसे मटर के दो अर्द्ध भाग’, अर्धनारीश्वर रूप यह उदहारण बताता है की एक के बिना दूसरा अधूरा है। यह बहुत बड़ा अंतर है पाश्चात्य और भारतीय चिंतन में।
नारी-विमर्श और स्वतंत्र सहवास के विभिन्न अर्थ
आधुनिक पीढ़ी की दृष्टि से स्त्री विमर्श का निहितार्थ क्या है, इसे जाने बिना आगे बढ़ना बेमानी होगी। विभारानी श्रीवास्तव के अनुसार- नारी-विमर्श पश्चिमी देशों से आयातित एक संकल्पना (विचार) है। इंग्लॅण्ड और अमेरिका में उन्नीसवीं शताब्दी में फेमिनिस्ट मूवमेंट से इसकी शुरुआत हुई। यह आन्दोलन लैंगिक समानता के साथ-साथ समाज में बराबरी के हक के लिए एक संघर्ष था, जो राजनीति से होते हुए साहित्य, कला, एवं संस्कृति तक आ पंहुचा, बाद में यह आन्दोलन विश्व के कईं देशों से होता हुआ भारत तक पंहुचा। पल्लवी सक्सेना के अनुसार- समाज में नारी के प्रति जागृति लाना तथा नारी के अस्तित्व की, पहचान को स्थापित करने के प्रयास को ही नारीवाद अथवा नारी विमर्श कहा जाता है। वंदना गुप्ता के अनुसार- “स्त्री-विमर्श ने असली जमा तभी से पहना जब से महिला दिवस और स्त्री सशक्तिकरण जैसे मुद्दों और दिनों की शुरुआत हुई। स्त्री विमर्श का सम्पूर्ण अर्थ तभी मायने रखता है जब हम उसके न केवल सकारात्मक बल्कि नकारात्मक पहलू पर भी ध्यान दें”। डॉ. कौशलेन्द्र मिश्र के अनुसार- “नारी-विमर्श और सेक्सुअल आजादी और इसके लिए उठती आवाज आज अधिकारों की स्वतंत्रता के आसपास केन्द्रित हो गया है। कहीं-कहीं तो यह विमर्श पुरुष के प्रति विद्रोह और पुरुषविहीन समाज की अव्यवहारिक कल्पना तक जा पंहुचा है।’ गुंजन झाझरिया ‘गुंज’ के अनुसार – “नारी-विमर्श क्या है? पुरुष की नजर में कहूँ तो इस विमर्श का सम्बन्ध नारी सौदर्य, नारी का पहनावा, नारी उत्पीडन, नारी का दुःख, नारी की कमजोरियों से ही होता है। और नारी की नजर में नारी विमर्श का सीधा सम्बन्ध अपनी शक्तियों से परिचित करवाने से है”। मुकेश कुमार तिवारी के अनुसार- “नारी उत्थान की बातें मुझे अक्सर मुखशुद्धि की तरह लगती हैं कि जो कुछ भी खाने के बाद हम खाना चाहते हैं तो सिर्फ अपने उच्छवासों सुवासित करने के लिए”।
यह भी पढ़ें-
मानव-मन विपरीत लिंग की और आकर्षित क्यों होता है?
सह अस्तित्व, लिव इन रिलेशनशिप की यह चर्चा अधूरी न रहे, तो आइये जानते है इस विमर्श के मनोविज्ञान को। क्या आपने कभी सोचा है कि मानव-मन विपरीत लिंग की और आकर्षित क्यों होता है? मैं यहाँ बायोलोजिकल बात नहीं कर रहा। यहाँ मनोवैज्ञानिक चर्चा हो रही है जिसका आधार फ्रायड का दर्शन नहीं, भारतीय दर्शन है। इस परिचर्चा में इसका संकेतन किया जा चुका है। कोई भी वस्तु जड़ हो या चेतन, अपने मूल से दूर होने के बाद उससे पुनः जुड़ना चाहती है। यह प्रकृति का सार्वभौमिक सत्य है। अंश, अपने अंशी से मिलने के लिए सदैव बेकरार और आग्रही रहता है। गृह-पिंड और वस्तुओं के बीच परस्पर आकर्षण इसी कारण है। पृथ्वी यदि सूर्य से बंधी है तो चन्द्रमा पृथ्वी से, और सूर्य – पृथ्वी – चन्द्रमा, ये सभी आकाशगंगा से क्रमशः श्रंखलाबद्ध हैं सभी… । और अंततः सभी मूल ‘कृष्ण विवर’ (ब्लैक होल) से बंधे हैं।
हमें सत्य और शुभ अच्छा क्यों लगता है?
हमें सत्य और शुभ अच्छा क्यों लगता है? सौंदर्य और शुभत्व क्यों मन मोह लेते हैं? अच्छाई चाहें कहीं भी हो, बैरी में हो तो भी एक बार अच्छी जरूर लगती है, आखिर क्यों? इसलिए मूल तत्व का गुण ही वही है – “सत्यम् – शिवम् – सुन्दरम्”। मूलतत्व, परमतत्व ‘ब्रह्म’ है। इस ब्रह्म का स्वरूप ही है – ‘सच्चिदानंद’ (सत + चित + आनंद)। ब्रह्म के द्विद्धा विभाजन से दो अंग होने जाने के कारण पुरुष और स्त्री दो रूप में अलग-अलग हो गए हैं। अपने मूल उत्स से मिलने की चाह में दोनों परस्पर जुड़कर एक हो जाना चाहते हैं। एक होने की यह चाहत सामाजिक क्षेत्र में ‘प्रेम’ की संज्ञा पाती है और आध्यात्मिक क्षेत्र में ‘भक्ति’ की। स्त्री और पुरुष दोनों ही अधूरे हैं, वे घुल-मिलकर ही पूर्णता को, आनंद को, सच्चिदानंद को प्राप्त कर सकते है। इसी आनंद के लिए जाने-अनजाने वे एक दूसरे की ओर आकर्षित होते भी हैं और करते भी हैं। भले ही स्वयं मानव को इसका बोध हो अथवा न हो। पुरुष-तत्व और नारी-तत्व मिलकर युग्मरूप से ही इसे सार्थकता प्रदान करते है। लौकिक उदाहरण से इसे इस प्रकार समझा जा सकता है– पुरुष यदि विजय है, तो नारी है उसकी विजयाशक्ति। पुरुष यदि दीपक है, तो स्त्री है उसकी ज्योति, रश्मि, किरण और प्रभा। एक दूसरे के अभाव में है ज्योतिहीन, मृत्तिका मात्र। पुरुष यदि मकान है, तो नारी है- ‘गृहलक्ष्मी’। दोनों मिलकर घर बनाते हैं। एक दूसरे के अभाव में वह है- मात्र एक ढांचा, ईंट की चार दीवारी का और कंक्रीट की छत का।
नारी यदि पूजा है, आराधना है, तपस्या है, वंदना है, तो पुरुष है– ‘प्रसाद’
इसी प्रकार नारी यदि पूजा है, आराधना है, तपस्या है, वंदना है, तो पुरुष है– ‘प्रसाद’। नारी यदि पुष्प है, सुमन है, कुसुम है, चम्पा, चमेली, गुलाब है तो पुरुष है– ‘माली’। नारी ख़ुशी है, शांति है, प्रगति है, सौन्दर्य है और यही तो मानव का लक्ष्य है। पुरुष इन्हें सदैव ढूंढता रहता है। पुरुष के जीवन में इनका अभाव ही उसे अमर्यादित-कुकर्मी-बलात्कारी-हैवान और राक्षस बना देता है। इसी प्रकार नारी जीवन में पुरुषोचित तत्वों का अभाव ही उसे पतित कर उसे कुलटा – कुलक्षिणी – वैश्या – राक्षसी बना देता है।
प्रत्येक पुरुष मन में नारी-तत्व का वास है
परमतत्व का अंश होने के कारण संरचना की दृष्टि से भले ही अलग-अलग सांचे में ढले हों, वास्तविकता यही है कि प्रत्येक पुरुष मन में नारी-तत्व का वास है, तो नारी मन में पुरुष का निवास। पुरुष मन में जो सुकोमल संवेदनाएं है नारी-तत्व के कारण हैं, इसी प्रकार नारी मन की सुदृढ़ संकल्पनाएँ पुरुष तत्व के कारण है। गुरु नानकदेव ने इसीलिए कहा था– “नारी पुरख पुरख सब नारी सब एको पुरखु मुरारी”। इसलिए पुरुष को जब पुरुष बनकर सफलता नहीं मिलती, तो वह नारी बनकर सफलता प्राप्त करता है। निर्गुण संतों ने नारी बनकर प्रभु, प्रियतम, पति, भर्तार को प्राप्त किया था; तो इस रसानुभूति के लिए राधा ने भी कई-कई बार कान्हा रूप धारा, पुरुष होने का स्वांग भी रचा था। हां, मीरा प्रभृति संत को पुरुष नहीं बनना पड़ा। अपने नारीत्व को जागृत कर ही उन्होंने प्रभु- प्रियतम भर्तार को प्राप्त किया था। इस दृष्टि से मीरा को श्रेष्ठतर मानना पड़ेगा। मीरा ने दो विवाह किया था- एक लौकिक विवाह भोजराज के साथ और एक अध्यात्मिक विवाह गिरिधर गोपाल के साथ। भारतीय परिवेश में विवाह पवित्र गठबंधन है। यहाँ मानव-तन जड़ होने के कारण यदि विपरीत लिंग की और आकर्षित है तो चेतन-मन चैतन्य होने के कारण भाव-साम्य, भाव-एकत्व और भावनात्मक पूर्णता के लिए आकर्षित है।
यदि पाश्चात्य देशों की करें तो वहां ऐसी ललक, ऐसा उत्साह और उमंग नहीं है
अब बात यदि पाश्चात्य देशों की करें तो वहां ऐसी ललक, ऐसा उत्साह और उमंग नहीं है क्योकि वहां दर्शन और चिंतन में ही समानता का भाव नहीं है। वहां पुरुष की स्थिति उस ‘गोजर’ की तरह है जिसकी एक टांग अलग हो जाने के बाद भी उसके क्रिया-कलापों पर प्रभाव नहीं पड़ता, उसके समस्त कार्य-व्यापार निर्बाध चलते रहते हैं। श्रेष्ठता के दंभ में यदि पुरुष फूला-फूला दम्भी बना रहता है, तो नारी भी उस एक टांग को लेकर गोजर से जुड़ने को उतावली नहीं रहती। अपितु अपने को हीन मानकर घुटती रहती है और बाहर-भीतर कार्य करते हुए भी इस असमानता को दूर कर बराबरी के लिए छटपटाहट का एक भाव कहीं न कहीं मन में दबा पड़ा रहता है और जब भी अन्कुरण के लिए अनुकूल परिष्ठितियाँ मिलाती हैं, वह आक्रोश छलक पड़ता है। वहां यदि पुरुष और स्त्री में लगाव या आकर्षण है भी तो वह मात्र दैहिक है, बायोलोजिकल है। वहां फ्रायड का मनिवैज्ञानिक सिद्धांत कार्यरत है। वहां विवाह एक समझौता है, इसलिए यदि विवाह संस्था का अवमूल्यन किया जाता है अथवा विवाह को अस्वीकार / अमान्य घोषित किया जाता है, जब विवाह से अस्वीकृति की जाती है तो बहुत आश्चर्य नहीं होता। आश्चर्य तब होता है जब वहां स्त्री अधिकार के नाम पर नारीत्व और मातृत्व को नकार देती है. अपने अधिकार के लिए वह नारे लगाती है, आन्दोलन करती है और इसे क्रान्ति का नाम देती है।
जब एक स्त्री स्त्रीत्व से ही इंकार कर दें
यह ‘क्रांति शब्द सुनने में बहुत अच्छा लगता है। इस छोटे से शब्द में एक नया इतिहास लिखने और पुराने को बदलने की शक्ति है। लेकिन आज क्रांति के नाम पर नारी ने सिर्फ अपनी जिद दिखलाई है। शायद इसी लिए सकारात्मक परिणाम नहीं दिखाई देते हैं और स्थिति बद से बदतर होती चली गयी है। इससे बुरी स्थिति और क्या होगी जब एक स्त्री स्त्रीत्व से ही इंकार कर दें।
नारीत्व और स्त्रीत्व से मुक्ति का प्रश्न
नारीत्व और स्त्रीत्व से मुक्ति का प्रश्न आज सर्वाधिक विचारणीय प्रश्न है। इससे मुख मोड़ना आत्मघाती होगा। प्रश्न है, आचार-विचार में यह परिवर्तन सैद्धांतिक शब्दविन्यास के कारण है या अर्त्दुर्बोधता के कारण? बिना इस मर्मभेदन के स्वतंत्रता का लक्ष्य, इसके उद्देश्य की पूर्ति संभव है क्या? पाश्चात्य और भारतीय परिवेश में मान्यताओं में भिन्नता के कारण एक ही शब्द ‘स्वतंत्रता’ और ‘मुक्ति’ की परिभाषाएं भी बदल जाती हैं– “मुक्ति चाहती है स्त्री / उठा था यह नारा पश्चिम में / उठा था किन्तु हजारों वर्ष पूर्व भारत में भी / मुक्ति चाहता है मानव / मुक्ति किससे? / अपनी भीरुता से, अज्ञान से, अशिक्षा से / मुक्ति प्रमाद से, जड़ता से, रुढियों से / भला कौन नहीं चाहता ऐसी मुक्ति / पर नहीं, नारों में खो जाते हैं मूल प्रश्न / कोई नहीं सोचता इस मूल मुक्ति की बाबत / तथाकथित मुक्ति मिली भी तो नारीत्व से / जो उसका गौरव था । पुरुषविहीन जीवन को अपनानेवाली स्त्री / क्या एकांगी नहीं होती गयी /.. अर्द्ध नारीश्वर की अमूल्य खोज / जगत को देने वाले इस देश में / हास्यास्पद जान पड़ती है स्त्री विमर्श की बात”।
भारतीय परिवेश में मनुहार और प्रायश्चित की पुरानी परंपरा है
भारतीय परिवेश में मनुहार और प्रायश्चित की पुरानी परंपरा है। इस मनुहार में जो गहराई है, जो आत्मीय भाव है, आत्मग्लानि का जो अनूठा अंदाज है, वह ‘एक्स्क्युज मी’ में कहाँ? इस मनुहार की परंपरा को विकसित करना पड़ेगा। ‘एक्सक्यूज मी’ का प्रयोग हमारी भावनात्मकता को, हमारी संवेदना को बहुत हल्की / सतही कर देता है, कार्यालय के लिए तो यह ठीक है, लेकिन मनुहार से पारिवारिक और दाम्पत्य जीवन में जो सर्जनात्मक ऊर्जा प्रतिक्रिया स्वरूप मिलती है उसका कोई जवाब नहीं है। मनुहार को ‘पुरुष का स्तुत्य प्रयास’ कहा जाता है और नारी से भी इसी तरह की अपेक्षा की जाती है। अपनी एक रचना में मैंने इसी बात को स्पष्ट करने का प्रयास किया है “एक गुनगुनाता हुआ शर्मिला सा सुकोमल नारीमन, यदि चुप हो जाय तो उसका मनुहार होना चाहिए, स्तुत्य है इस व्यथा निवारण का यह पुरुष प्रयास। परन्तु एक चुप हो चुके पुरुष मन को, मनाने और गुदगुदाने का, समझने और समझाने का नारी प्रयास क्या अर्थहीन है? औचित्यहीन है? और क्यों? सामंजस्य और भाव-संतुलन के स्थान पर उसे पाषाण पुरुष की संज्ञा, आखिर है क्या? क्रूरता या कायरता? कौन करेगा निर्णय? किसने देखा है पाषाण पुरुष की बेजान चुप्पी में, उसके गहन-गाम्भीर्य शान्ति में, वल्लियों उठ रहे कलोल और कोलाहल को? शान्ति सागर में हिलोरें मार रहे ज्वार- भाटा को? क्या यह अवमूल्यन नहीं, मानव की चेतना का? बौद्धिकता का? चिंतन की वेदना का? चिंतन की संवेदना का? संवेदना की स्वतन्त्रता का?”
समाज की वर्तमान स्थिति
यह ऐतिहासिक सत्य है कि सैद्धांतिक रूप से मान्यता के बावजूद पुरुष-नारी में समानता का स्वरुप प्रायः कम ही रहा है। नारी या तो देवी है या स्वर्णाभूषित सौन्दर्मायी रानी या कुलीन कुलवधु। या तो है वह सेविका, दासी अथवा एक कुलटा नारी। समाज में प्रायः यही रूप है उसका। मानने वालों ने नारी को पुरुष से चार कदम आगे माना और कहा– ‘नर से नारी, दो दो मात्राओं में भारी’। इसलिए नारी-विमर्श पर विचार करते समय जो पहला प्रश्न मन में उठता और कौधता है, वह यही है जिसे मैंने अपनी एक रचना में उठाया है – “नर से जो द्विगुणित है नारी / वह नारी क्यों आज है हारी? / शक्ति स्रोत है नाभि में जिसके / आखिर उसकी क्या लाचारी?” इस प्रश्न के उत्तर में कई तर्क (और कुतर्क भी) हैं। नारी साहस और सहनशीलता के क्षेत्र में भी अपना उदहारण स्वयं आप ही है, लेकिन फिर भी कठघरे में है – खाने को वह गम खाती है, और पी जाती सब खारा पानी। फिर भी जाए छलक कभी तो, खुद को कठघरे में पाती और यह अभिव्यक्ति भी सत्य है कि सितम इतना कि – ‘हर रात उसकी उम्मीदों पर / टूटी उम्मीदों का कफ़न चढ़ा / उनका अग्नि संस्कार कर / आँखों के गंगाजल से / खुद को शुद्ध करती है..” लेकिन वह निष्प्राण नहीं है, ताबूत वह नहीं है। आखिर हो भी कैसे सकती? वह तो प्रकृति की सवश्रेष्ठ रचना मानव की ‘माँ’ है, ‘माँ’ इस नाते सर्वश्रेष्ठा है… प्रकृति का अपना ही जीता-जगता स्वरूप है वह। भावनाओं–संवेदनाओं का विविध आयाम है वह। संवेदनाओ के ये अयाम ही यदि उसकी शक्ति है तो उसकी कमजोरी भी।
गांधारी का प्रतीक
गांधारी का प्रतीक लेकर शब्दों की कुशल चितेरी वंदना गुप्ता जी ने इसे बहुत ही ओजस्वी, तर्कपूर्ण, शब्दावली में प्रस्तुत कर अपनी अनोखी शैली से कथ्य–तथ्य और साहित्य को समृद्ध किया है। नारी की पहचान उसकी ममता, धैर्यता और मर्यादा से है। मगर ‘दुःख की बात तो यही है कि यह पहचान बनाकर भी स्त्री कमजोर है… उनको अपनी इज्जत प्यारी लगाती है और वे सारे अन्याय सह लेती है।” नारी की सशक्त बनाने के लिए ममता को छोड़, समता को अंगीकार करना पड़ेगा। क्योंकि ममता की आड़ में ही कहीं न कहीं विकृतियाँ अपने लिए स्थान, फलने-फूलने का अवसर ढूंढ लेती हैं। तभी तो कहना पड़ता है– “गृह अन्दर नारी का शासन है / पर घर–घर एक दुशासन है / दुशासन तो घर में ही पलता / माँ आखिर उसको देख न पाती /.. कहती वह जिसको लाल ! लाल !! / वही करता नारी को हलाल / यह नारी के लाल की करनी है / नारी का शव, ये लोथड़े लाल”।
यह राक्षसी वृति घरों के अन्दर भी प्रवेश कर चुकी है
यह राक्षसी वृति घरों के अन्दर भी प्रवेश कर चुकी है। चिंतन दोष और मानवीय मूल्यों के अभाव में आज बाप और भाई पर भी उंगलियाँ उठने लगी है। इसी सप्ताह ऐसा ही एक शर्मनाक और घृणित प्रकरण प्रकाश में आया है, जिसमे सगी माँ की संलिप्तता भी बताई जा रही है। नारी के ऊपर अत्याचार में नारी की इस भूमिका पर क्या कहा जाय? बाप – भाई और माँ जैसे पवित्र संबंधों पर यह आरोप कोई दूसरा नहीं अपनी बेटी ही लगा रही है। ओह! मानवीयता का ऐसा घोर पतन…??? इंसानियत क्या हारने लगी है अब…? कोई भी माँ ऐसी कुकर्मी औलाद नहीं चाहती, यह सच है लेकिन मोह-ममता में पड़कर कठोर कदम भी तो वह नहीं उठाती।
नारी तुम हारने लगी हो
इसके बाद तो मुंह से यही निकालता है– ‘नारी तुम हारने लगी हो / ईश्वर ने तुम्हें अबला नहीं / सृजना ही बनाया था / तुम यह कैसी कुसंस्कारी / खर पतवार का सर्जन करने लगी हो? नारी को पालन-पोषण के समय मोह-ममता रूपी ऐनक को, आँखों पर बंधी पट्टी को उतरना होगा, मोह ममता की यह पट्टी क्या गांधारी प्रवृत्ति की देन है? रचनाकार तो यही कहता है-
‘… तुम्हारी दर्शायी राह ने / न जाने कितनी आँखों पर पट्टी बंधवा दी / देख तो जरा / हर गांधारी ने आंख पर पट्टी बाँध / सिर्फ तुम्हारा अनुसरण किया / दोषी हो तुम स्त्री की सम्पूर्ण जाति का’। इसी पट्टी को खोलकर, खुले मन से सोचना होगा, आखिर माँ की शिक्षा पुत्री और पुत्र के लिए अलग-अलग कैसे हो जाती है –‘जब एक माँ अपनी / बेटी के दुपट्टे में इज्जत / संभालने का तरीका / समझाती है वह तो वह अपने बेटे को / राह चलती किसी की / बेटी की इज्जत करना / क्यों नहीं सिखाती?’
वैचारिक परिवर्तन के सूत्र
ममता को त्यागकर समत्व का, समता का अमृत उसे छकना होगा। समत्व की प्राप्ति कठिन तप की उपलब्धि है। तप के इस महत्व को भी बताया गया है– ‘जो तप करता है / परिवर्तन वही कर पाता है / और यह ईश्वर के तप का प्रभाव है / कि उसने नारी की कोमलता में / तप का संधान किया / फिर क्या प्रश्न / और किससे?’ लेकिन बदलते परिवेश में आज प्रश्न है- दिशा निर्धारण का प्रश्न। आन्दोलन की गलत दिशा को सही दिशा में मोड़ना भी एक तप है। धारा (आन्दोलन) की दिशा उलट कर उसे ‘राधा’ रूप में रूपांतरण बहुत बड़ा तप है, कठोर साधना है। नारी का राधा बनकर पुरुष के साथ ‘राधा-कान्हा’ का सह-अस्तित्व ही एक श्रेष्ठ समाधान हो सकता है। इस स्थिति में समाज ‘अर्द्धनारीश्वर’ की सर्वोच्च सोपान को भी स्पर्श करने की प्रत्याशा तो कर ही सकता है, जिसमे तत्सुखेन सुखिनः का स्थयी भाव है. अर्द्धनारीश्वर की मनसा – वाचा – कर्मणा व्यवहारिक स्वीकारोक्ति ही सर्वोपयोगी समाधान हो सकता है। लेकिन ध्यान रहे यह व्यवहारिक हो, मात्र सैद्धांतिक नहीं. क्योकि सैद्धांतिक स्वीकृति की परिणति क्या हो सकती है, इतिहास इसका साक्षी है। कई विचारकों ने इस प्रकार की संस्तुति दी है और कुछ ने थोड़े परिवर्तन के साथ –“हम वर्क फ़ोर्स में अपनी मौजूदगी और आर्थिक स्वावलंबन के रास्ते हासिल होने वाले सशक्तिकरण को लेकर चाहे कितने नारे क्यों न लगा लें, नारी विमर्श का एक बड़ा फैसला बिना समाज और पुरुषों की मानसिकता बदले लिया ही नहीं जा सकता”।
मानवतावादी विमर्श को जन्म दे सके
निश्चित रूप से आवश्यकता एक पूर्ण समीक्षा की ही है। एक ऐसी समीक्षा जो ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ के भेद से ऊपर उठकर मानवतावादी विमर्श को जन्म दे सके: जहाँ ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ के अधिकार और भागीदारी बराबर की हो। यहाँ भी समत्व और समता की आवश्यकता है क्योकि शोषण न तो लिंग भेद को पहचानती है, न रूप और रंग को मानती है। जो भी कमजोर है, वही शोषित है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, सवर्ण हो या दलित। ल.वि.वि.लखनऊ में आयोजित एक सेमिनार में प्रख्यात ओडिसी साहित्यकार प्रतिभा राय ने कहा– ‘‘स्त्रीविमर्श’ और ‘दलितविमर्श’ जैसे दायरों के मैं सख्त खिलाफ हूँ। कईं बार मुझे महिलावादी लेखक कहा जाता है लेकिन मैं रेडिकल फेमिनिस्ट, अतिवादी महिला लेखक नहीं हूँ”। परिवर्तन यदि प्रगति का सूचक है तो समाज को भी अपनी सोच में परिवर्तन लाना होगा। सामाजिक सोच बदल रही है, रचनाकारों ने इसे रेखांकित किया है, अनुभूत किया है –‘कुछ समाज बदला, कुछ समाज के जरूरतों के हिसाब से नीतियाँ बदलीं.. तो महिलाओं के लिए काम करना आसन हुआ’। यह क्या है? यह खुला दृष्टिकोण है जिसके मूल में है सामंजस्य। स्वतन्त्रता आवश्यक है लेकिन जागरूकता के अभाव में कब यह स्वच्छंदता बन जाती है पता ही नहीं लगता। धीरे-धीरे यही स्वच्छंदता अनैतिकता, पाप और दुराचार बन जाती है। अतएव जितनी आवश्यक यह स्वतन्त्रता है, उतना ही आवश्यक बंधन भी है।
‘नारी-विमर्श’
जहाँ तक ‘नारी-विमर्श’ की बात है, तो इस ‘नारी-विमर्श’ से समाज में जागृति आई है, वह भी अब पहले जैसा अंधविश्वासी नहीं रहा, लेकिन भौतिकवादी अवश्य हो गया है जहाँ संवेदनाओं का कोई मूल्य नहीं, वेदनाओं के प्रति लगाव नहीं, वहां धन ही सर्वोपरि बन गया है। आज मानवीय मूल्यों को खतरा इसी विचारधारा से है। आज एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि औरत सामाजिक स्तर पर अपनी आत्मगत कहाँ खोती गयी और वस्तुगतता में कब और क्यों रूपांतरित हो गयी? क्या औरत का वस्तुगत होना इंसानियत का पतन है? महाभारतकाल में द्रौपदी ने यही प्रश्न उठाया था। इसी के साथ जुड़ा हुआ प्रश्न है –“औरत की चेतना सिर्फ अपने आप को भोग्या बना देने तक सीमित है या वैश्वीकरण के चपेटे में बहकर बिक जाना उसके विकास की चरम स्थिति है? या यह कोई विकल्प है? इसका उत्तर देते हुए विचारक ने कहा है कि- “आज औरत अपने सौन्दर्य को भूल गयी है। और वाह्य सौन्दर्य के चपेटे में आकर, महज वस्तु बनकर रह गयी है। आतंरिक सौन्दर्य के स्तर पर औरत महाशक्ति और प्रेम से भरी है। यहाँ उसे सुरक्षा की आवश्यकता नहीं, पर भौतिकवाद की उत्पत्ति के साथ-साथ पुरुष औरत की आतंरिक शक्ति कहीं दब सी गयी है, इस शक्ति को पुनर्जीवित करना होगा, यही आज की आवश्यकता और युग की मांग भी है। पूरी विवेचना के बाद हम कह सकते हैं कि सनातन चिंतन “ज्ञान प्रधान है”, परवर्ती चिंतन “विज्ञान प्रधान है” तो आधुनिक चिंतन “भोग प्रधान” है। अब तो स्वेच्छाचार ही श्रेष्ठ प्राप्य और तृप्ति केंद्र बन गया है जो बहुत भयावह और डरावने भविष्य का सूचक है।

डॉ जयप्रकाश तिवारी (94533 91020)
बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश
