कादम्बिनी क्लब की 396वीं मासिक गोष्ठी में यह रहा खास आकर्षण, विभा व जगजीवनलाल को दी श्रद्धांजलि

हैदराबाद : कादम्बिनी क्लब हैदराबाद के तत्वावधान में 20 जुलाई को डॉ मदनदेवी पोकरणा की अध्यक्षता में गूगल मीट के माध्यम से क्लब की 396वीं मासिक गोष्ठी का सफल आयोजन सम्पन्न हुआ। प्रेस विज्ञप्ति में डॉ अहिल्या मिश्र (क्लब अध्यक्ष) एवं मीना मुथा (कार्यकारी (संयोजिका) ने आगे बताया कि शुभ्रा महन्तो द्वारा निराला रचित सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का आरंभ हुआ।

डॉ अहिल्या मिश्र ने पटल पर उपस्थित समस्त साहित्यकारों का शब्द कुसुमों से स्वागत करते हुए कहा कि कादम्बिनी क्लब 32वें वर्ष की यात्रा में निरंतर सभी को साथ लेते हुए अपना सफर जारी रखते हुए हिन्दी साहित्य की सेवा में समर्पित होकर कार्य कर रहा है। आज करीब 70 फीसदी साहित्यकार संस्था से जुड़े हुए हैं और क्लब के संपर्क में है। विशेष रूप से बहनों के लिए कार्यक्रम हेतु दिन का समय रखा गया है। उन्होंने आगे बताया कि डॉ आशा पांडे (साहित्यकार, अमरावती, महाराष्ट्र) अभिलेखों में साहित्य विषय पर प्रपत्र प्रस्तुत करेंगी। तत्पश्चात क्लब से वर्षों से निरंतर जुड़े हुए सदस्य विभा भारती एवं जगजीवनलाल अस्थाना सहर के दुःखद निधन पर क्लब की ओर से 2 मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

संगोष्ठी सत्र संयोजक अवधेशकुमार सिन्हा (नई दिल्ली) ने कहा कि आज का विषय बहुत ही रोचक है जिसमें भित्ति चित्रों से साहित्य को निकालकर यहाँ रखा जाएगा और यह कठिन कार्य, डॉ आशा पांडे करेंगी। साथ ही उन्होंने विषय प्रवेश कराते हुए भित्ति चित्रों का परिचय देते हुए कहा कि पहले कागज नहीं होता था, अतः संदेशों को छन्नी और हथौड़ों की मदद से पत्थरों पर लिखकर जन जन तक पहुंचाया जाता था। उन्होंने विभिन्न चरणों में लिपियों की विकास की बात भी की और आगे की जानकारी के लिए डॉ आशा पांडे को आमंत्रित किया।

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डॉ आशा पांडे ने अपने वक्तव्य में कहा कि अभिलेखों का मूल उद्देश्य प्रशासनिक था। भाषा, अलंकार, भाव साहित्य दिल में धडकता था जिसे जाहिर करने के लिए भित्ति चित्रों का सहारा लिया जाता था। सम्राट अशोक के अभिलेख बड़े हैं परंतु उसमें सत्ता का प्रदर्शन नहीं है। दक्षिण भारत के मंदिरों की दीवारों पर समकालीन राजाओं द्वारा अभिलेख लिखाये हुए नज़र आते हैं। अभिलेखों में आदेशों और संदेशों की भाषाएँ भी छंदबद्ध होती थीं।

इनमें रूपक का प्रयोग किया गया है और उपमाएँ दी गई हैं। ये अभिलेख ग्रामीण लोकजीवन की झाँकी प्रस्तुत करता है और लोकसाहित्य को दर्शाता है। इनमें आशाएँ और चेतनायें है। उन्होंने अभिलेख की लिपियाँ प्राकृत, पाली, ब्राह्मी, खरोष्ठी आदि के बारे में भी बातें कीं। डॉ अहिल्या मिश्र, सुनीता लुल्ला, रमा बहेड़, गीता अग्रवाल ने भी अभिलेखों के संदर्भ में जानकारी साझा की।

अवधेशकुमार सिन्हा ने सत्र का संचालन करते हुए कहा कि उस काल में बौद्ध धर्म, जैन साहित्य, बौद्ध साहित्य आदि का प्रभाव रहा है जो विभिन्न लिपियों में लिखी गईं हैं। डॉ मदनदेवी पोकरणा ने अध्यक्षीय टीप्पणी में कहा कि अनोखे विषय पर चर्चा में आनंद आया। आर्या झा ने सत्र का धन्यवाद ज्ञापित किया।

दूसरे सत्र में ही डॉ अहिल्या मिश्र की अध्यक्षता में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। सावन के आगमन से हर्षित रचनाकारों ने काव्य के सभी विधाओं में स्वनाएं प्रातुत की। डॉ इंदु सिंह, भावना पुरोहित, नमिता (भोपाल), आर्या झा, डॉ निशि कुमारी, पुष्पा वर्मा, शीला भनोत, सुनीता लुल्ला, विजया डालमिया, उमेशचंद्र श्रीवास्तव, दर्शनसिंह, रेखा अग्रवाल, गीता अग्रवाल, लता संघी, शिल्पी भटनागर, कल्याणी झा, विजया डालमिया, वर्षा शर्मा, हर्षलता दुधोडिया, रमा बहेड, चंद्र प्रकाश दायमा, अंशुश्री सक्सेना, भगवती अग्रवाल, उमा सोनी, प्रियंका वांजपे, मोहिनी गुप्ता, शोभा देशपांडे एवं मीना मुथा ने काव्यपाठ किया। सुखमोहन अग्रवाल, डॉ मदन देवी पोकरणा ने संस्था को शुभकामनायें दीं और महिला रचनाकारों को प्रोत्साहित किया। सरिता सुराणा, डॉ रमा द्विवेदी, मधु भटनागर, प्रवीण प्रणव, तृप्ति मिश्रा, विश्वेश्वर कुमार, सरिता दिक्षित आदि की पटल पर उपस्थिति रही।

डॉ अहिल्या मिश्र ने अध्यक्षीय काव्य पाठ किया और टिप्पणी देते हुए कहा कि आज सच में साहित्यिक सावन की वर्षा से कादम्बिनी क्लब सावनमय हो गया। उन्होंने युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें सृजन कार्य से इसी तरह जुड़े रहने को कहा। शिल्पी भटनागर ने सत्र का धन्यवाद दिया और तकनीकी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी का निर्वाह किया। मीना मुथा ने सफल संचालन की जिम्मेदारी निभाई।

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