जानें भारतीय संस्कृति के तीन प्रतिमान: नचिकेता, सावित्री और यमराज

यदि इस आलेख के शीर्षक पर विचार करें तो इसमें भारतीय संस्कृति के तीन प्रमुख पात्रों (नचिकेता, सावित्री और यमराज) के नामों /प्रतीकों का उल्लेख है। तीनों में क्या आपसी संबंध है? इन तीनों का ही किसी एक ही कथानक से संबंध नहीं है। यहां कथानक दो हैं किंतु इन तीनों में एक चरित्र ऐसा साझा चरित्र है जो दोनों कथानकों में समान रूप से सम्मिलित है, और वह चरित्र है – मृत्यु के देवता यमराज (धर्मराज अथवा यमाचार्य) का चरित्र।

एक कथानक के मूल में “नचिकेता – यमराज संवाद” है तो दूसरे कथानक के मूल में है – “सावित्री – यमराज” संवाद। इनमें समानता यह है कि नचिकेता और सावित्री दोनों को यमराज ने तीन-तीन वरदान दिए हैं। दूसरी समानता यह है कि यमराज के अपने पोक में उपस्थित न रहने के कारण नचिकेता तीन दिन बिना अन्न जल के प्रतीक्षा रहा, वहीं सावित्री ने सत्यवान की मृत्यु तिथि से तीन दिवस पूर्व से ही अन्न का त्याग कर दिया था। इसके अतिरिक्त एक समानता और भी है; नचिकेता और सावित्री दोनों ने पहले अपने स्वार्थ, या आत्मकल्याण की मांग नहीं की। दोनों ने पहले पितृ-कल्याण, परिजन-कल्याण, लोक-कल्याण का ही वर मांगा और तीसरे वरदान में आत्मकल्याण, आत्म-अस्तित्व, अपनी अस्मिता या नारीत्व पूर्णता का वरदान मांगा। यद्यपि आत्म-अस्तित्व और नारीत्व की पूर्णता का निहितार्थ अलग-दिखता हुआ भी प्रकरांतर से एक सा ही है। “पुरुष और प्रकृति”, “शिव और शक्ति” दो तत्त्व दिखते हुए भी, वस्तुत: दो नहीं है। दोनों में एकत्व बोध होना ही अमरत्व है। इन दोनों ही कथानकों में मृत्यु और अमरत्व की ही अनूगूंज गुंजित है। यहां एक अंतर यह है कि “नचिकेता स्वयं चलकर यमराज के पास गए थे”, वही “सावित्री के पास यमराज उसके पति का प्राण लेने आए थे”।

नचिकेता की कथा

मन में जिज्ञासा उठती है कि बालक नचिकेता आखिर यमराज के पास गया ही क्यों था? उत्तर जानने के लिए आर्ष ग्रंथों की शरण में जाना पड़ेगा। नचिकेता की कथा का वर्णन तैतरीय ब्राह्मण, कठोपनिषद् और महाभारत आदि ग्रंथों में मिलता है। नचिकेता ऋषि वाजश्रवस (या कुछ परंपराओं में उद्दालक) का पुत्र है। नचिकेता लगभग पाँच साल का एक बुद्धिमान और जिज्ञासु बालक था। एक बार नचिकेता के पिता, ऋषि वाजश्रवस ने एक यज्ञ किया, जिसमें उन्होंने बूढ़ी और अत्यंत कमजोर, दूध देने में अक्षम गायों का दान किया। नचिकेता ने अपने पिता के इस कार्य पर औचित्य का प्रश्न उठाया, इसे अनुचित बताया जिससे पिता क्रोधित हो गए। गुस्से में आकर, पिता ने नचिकेता को यमराज को देने की बात कही। नचिकेता ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और यमलोक चला गया। लेकिन यमराज उस समय अपने आवास पर मौजूद नहीं थे। नचिकेता तीन दिन तक यमलोक के द्वार पर ही भूखा-प्यासा बैठा रहा। जब यमराज लौटे, तो उन्हे मैं में अपराध बोध हुआ। उन्होंने नचिकेता के दृढ़ संकल्प से प्रभावित होकर उसे तीन वरदान दिए।

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नचिकेता को दुनिया का पहला महत्वपूर्ण और प्रौढ़ जिज्ञासु ब्रह्मचारी माना जाता है। कठोपनिषद में दी गयी नचिकेता की कहानी अत्यंत प्रेरणादायी है। नचिकेता-यमराज संवाद से एक छोटे से बालक के साहस, पितृभक्ति और द‍ृढ़ निश्चय की बातें पता चलती हैं। नचिकेता ने यमराज से तीन वरदान मांगे थे।

पहला वरदान

पहला वरदान नचिकेता ने यह मंगा था कि यमराज उसे वापस उसके पिता के पास भेजें, जहाँ उसके पिता का क्रोध शांत हो जाएँ – “सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गोतमो माऽभिमृत्यो” अर्थात हे यमराज! मेरे पिता शांत हों, उनका क्रोध शांत हो जाय और वे मुझसे प्रेम से व्यवहार करें। लोक भाषा हिन्दी में इस प्रसंग को प्रौढ़ विचारक माधुरी महाकश ने चर्चित ग्रंथ “हे नचिकेता” में लिखा – “हे देव तात का में उद्धार मांगता हूं / पिता हेतु समस्त में उपकार मांगता हूं / करें निवारण दोषों का उत्पन्न हुए जो / बहुतेरे पापों से निर्वाण मांगता हूं /.. मेरे प्रति अपार क्रोद्धाग्नि शमन हो जाए / तात को मेरे प्रशांत और प्रसन्न कर दो”।

दूसरा वरदान

दूसरा वरदान उसने यह मंगा था कि हे यमराज! मुझे अग्नि विद्या का ज्ञान दें – “स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम”। अर्थात हे यमराज! मुझे अग्नि विद्या का वह ज्ञान दीजिए जो स्वर्ग तक ले जाती है। यमराज ने पंचाग्नि विद्या दी, जिसे नचिकेता के नाम पर ही “नचिकेताग्नि” नाम पड़ा। माधुरी महकश के शब्दों में – “कृपया करें प्रदान ज्ञान वह / चिर स्थाई और शाश्वत है / परम ज्योत्सना है सुंदरतम / वह आत्मबोध की कारक है / हे देव! करें पावन उपदेश / में भी तो परिचित हो जाऊं / ब्रह्म अग्नि क देखूं स्वरूप / मोक्ष मार्ग का द्वार बनाऊं / द्वितीय वर स्वरूप है मृत्यु! / दिव्य अग्नि क उपदेश करें / चेतना स्वरूप पहचान सकूं / दिया जीव पर परमेश करें”।

तीसरा वरदान

तीसरा वरदान में उसने यह मांगा था कि हे यमराज! उसे मृत्यु के रहस्य के बारे में बताएं – “प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एटाद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः”॥ अर्थात हे यमराज! मुझे मृत्यु के रहस्य के बारे में बताएं कि मृत्यु क्या है? मृत्यु के बाद क्या होता है? माधुरी महकाश के शब्दों में – “हे यमाचार्य कह दें मुझसे / क्या है शाश्वतता जीवन की / क्यों यह अजर अमर अविनाशी / आत्मा एक अबूझ विद्या सी / क्या आत्मा का सम्पूर्ण विनाश / इस देह संग हो जाता है / क्या अस्तित्व सूक्ष्म शरीर का / कारण संग विलीन होता है / क्या यह भौतिक शरीर सर्वस्व / है आत्मा कोई वस्तु नहीं / या आत्मा ही इकमात्र अमर / स्थाई शरीर यह तनिक नहीं / आत्मा के अस्तित्व ज्ञान की / वर हेतु याचना करता हूं / संग लिए अति गूढ़ प्रश्न को / गुह्य की कामना रखता हूं।”

यमराज ने यह आत्मज्ञान देने से पूर्व नचिकेता को बड़े-बड़े प्रलोभन दिए, किंतु नचिकेता अपने प्रश्न पर अडिग बना रहा। प्रसन्न होकर यम ने इस गूढ़ विद्या का रहस्योड़ग किया। इस प्रकार नचिकेता ने यमराज से मृत्यु से अमरता का ज्ञान,”श्रेयस” की प्राप्ति की।

सावित्री की कथा

राजा अश्वपति को कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति की लालसा में उन्होंने सपत्नीक “देवी सावित्री” की विधिवत पूजा आराधना कर देवी के आशीर्वाद से एक पुत्री और एक पुत्र प्राप्त किया। पुत्री का नाम राजा ने उपास्य देवी के नाम पर ही “सावित्री” रखा। इसी सावित्री ने यमराज से संवाद कर तीन वरदान प्राप्त किए थे।

विवाह योग्य होने पर एक दिन राजा अश्वपति ने सावित्री को बुला कर कहा कि पुत्री! तुम अत्यन्त विदुषी हो, सर्वगुण संपन्न हो। अतः अपने अनुरूप पति की खोज तुम स्वयं ही कर लो। पिता की आज्ञा पाकर सावित्री एक वृद्ध तथा अत्यन्त बुद्धिमान मन्त्री को साथ लेकर पति की खोज हेतु देश-विदेश के पर्यटन के लिये निकल पड़ी। पति चयन के पश्चात सावित्री पिता गृह वापस लौट आयी और पिता से कहा – हे पिता श्री! आपकी आज्ञानुसार मैं पति का चयन कर वापस लौटी हूँ। शाल्व देश में द्युमत्सेन नाम से विख्यात एक बड़े ही धर्मात्मा राजा थे। किन्तु बाद में दैववश वे अन्धे हो गये हैं। जब वे नेत्रहीन हो गए उस समय उनके पुत्र की बाल्यावस्था थी। द्युमत्सेन के अंधत्व तथा उनके पुत्र के बालपन का लाभ उठा कर उसके पड़ोसी राजा ने उनका राज्य छीन लिया है। तब से वे अपनी पत्नी एवं पुत्र सत्यवान के साथ वन में रहते हैं, मैने उन्हीं सत्यवान का पति रूप में चयन किया है।

सावित्री की बातें सुनकर राज दरबार में उपस्थित देवर्षि नारद बोले कि हे राजन्! पति के रूप में सत्यवान का चुनाव करके सावित्री ने बड़ी भूल की है। नारद जी के वचनों को सुनकर अश्ववपति चिन्तित होकर बोले के हे देवर्षि! आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? इस पर नारद जी ने कहा कि राजन्! सत्यवान तो वास्तव में सत्य का ही रूप है और समस्त गुणों का स्वामी भी है। किन्तु वह अल्पायु है और उसकी आयु केवल एक वर्ष ही शेष रह गई है। उसके बाद वह मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। देवर्षि की बातें सुनकर राजा अश्वपति ने सावित्री से कहा कि पुत्री! तुम नारद जी के वचनों को सत्य मान कर किसी दूसरे उत्तम गुणों वाले पुरुष को अपना पति के रूप में चुन लो।

इस पर सावित्री बोली कि हे तात्! भारतीय नारी अपने जीवनकाल में केवल एक ही बार पति का वरण करती है। अब चाहे जो भी हो, मैं किसी दूसरे को अपने पति के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। सावित्री की द‍ृढ़ता देखकर राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ कर दिया। विवाह के पश्चात् सावित्री अपने राजसी वस्त्राभूषणों को त्यागकर तथा वल्कल धारण कर अपने पति एवं सास-श्वसुर के साथ वन में रहने लगी।

अन्ततः वह दिन भी आ ही गया जिस दिन सत्यवान की मृत्यु सुनिश्चित थी। उस दिन सावित्री ने द‍ृढ़ निश्चय कर लिया कि वह आज अपने पति को एक भी पल अकेला नहीं छोड़ेगी। अपने सास-श्वसुर से आज्ञा लेकर सत्यवान के साथ गहन वन में चली गई। लकड़ी काटने के लिये सत्यवान एक वृक्ष पर जा चढ़े किन्तु थोड़ी ही देर में वे अस्वस्थ होकर वृक्ष से उतर आये। उनकी अस्वस्थता और गहन पीड़ा को देखकर सावित्री सब कुछ समझ गई। वह जान गई कि अब सत्यवान का अन्तिम समय आ गया है, इसलिये वह चुपचाप अश्रु बहाते हुये ईश्वर से प्रार्थना करने लगी।

यमराज प्रकट हुए तथा सत्यवान का प्राण हरणकर यमलोक जाने लगे। सावित्री उनके पीछे चल पड़ी। यमराज ने पीछे-पीछे सावित्री को पीछे पीछे आता देख कर उसे वापस लौट जाने को कहा, किंतु सावित्री वापस लौटने को तैयार नही हुई। सावित्री की पतिधर्मपरायाणता, शालीनता, विवेकशीलता वाक कौशल से यमराज बहुत प्रसन्न हुए तथा सत्यवान के प्राण को छोड़कर अन्य वर मांगने का प्रस्ताव सावित्री को प्रसन्न होकर दिया। सवित्री ने यमराज से बड़ी कुशलता, बुद्धिमत्ता और मेधा शक्ति से सबकुछ मांग लिया। इस प्रकार सावित्री ने सम्पूर्ण “प्रेयस” की प्राप्ति की। लोकेषणाओं की प्राप्ति की।

सावित्री ने यमराज से तीन वरदान मांगे थे – (1) अपने सास-श्वसुर को नेत्र ज्योति की वापसी, (2) अपने स्वसुर के खोए हुए राज्य की पुनः प्राप्ति, और (3) सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान।

पहला वरदान

सावित्री ने पहला वरदान मांगा था- “न्यग्रोधस्येव रूपवती नता / श्लिष्टं मनो यमराजस्य मेधावी”। अर्थात मेरे श्वसुर की नेत्र ज्योति वापस आ जाए।

दूसरा वरदान

सावित्री ने दूसरा वरदान मांगा था – “राजपुत्रस्य स्वराज्यं देहि मे / यथा पूर्वं राज्यं मे”। अर्थात मेरे श्वसुर का खोया राज्य उनको पुन: प्राप्त हो जाए।

तीसरा वरदान

सावित्री ने तीसरा वरदान मांगा था – “शतम पुत्रान् ददासि मे / यथा पूर्वं पुत्रान् मे” अर्थात मुझे सौ पुत्रों की मां होने का वरदान दीजिए। यमराज ने कहा – “तथास्तु”। अब सावित्री ने कहा कि हे धर्मराज जी! अभी-अभी आपने मुझे पुत्रवती होने का वरदान दिया है और मेरे पति के प्राण को लिए जा रहे हैं। हे प्रभो! पति के अभाव में आपका वरदान कैसे पूर्ण होगा? यमराज अपने वचन में फंस गए थे, उन्हे सत्यवान की जीवनदान देना पड़ा। इस प्रकार सावित्री ने अपने वरदानों का सदुपयोग कर सभी वांछित प्राप्त कर लिए तथा अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल दिया। यह था एक भारतीय नारी के सतीत्व और नारीत्व बल का अद्भुत चमत्कार।

निष्कर्ष

मानव भौतिक सुख, लोकेषणा (प्रेय) और वैराग्य प्रधान (श्रेय) के मध्य ही दोलित होता रहता है। इनमें कुछ विरले मनुष्य ही हैं जो प्रेय पथ छोड़कर श्रेय पथ का अनुगमन करते हैं। इस संबंध में श्रीमद्भगवदगीता माता कहती (7.3) में कहती है कि हजारों।, लाखों मनुष्यों में वैराग्य और सिद्धि का मार्ग उसी विरले कृपा पात्र को प्रप्त होता है जिसे परमात्मा अपने पास बुलाते हैं। वस्तुत: मानव अपने जीवन में अपने लक्ष्य के अनुरूप अपने प्राप्य को, अपनी अटल जिजीविषा, आत्मबल, त्याग, समर्पण, साधना और बुद्धि कौशल से, लोभ मोह में फंसे बिना “श्रेय” या “प्रेय” , “काम” या “मोक्ष” जैसे पुरुषार्थ की प्राप्ति कर सकता है। वह धर्म का पालन कर “अर्थ”, “काम” और “मोक्ष” की क्रमिक प्राप्ति भी कर सकता है, इसमें कोई संदेह नहीं। नचिकेता की कथानक में जहां मृत्यु का रहस्य जानकर अमरत्व की प्राप्ति ही “श्रेयस” है, वहीं सावित्री की कथानक में शतपुत्रो को माता बनना, राज्य की दुलारी बहू बनना लौकिक सुख है, यह प्राप्य “प्रेयस” की श्रेणी में है।

यहां इस विंदु पर एक बड़े दार्शनिक प्रश्न का भी उत्तर मिल जाता है कि एक ही गुरु या शिक्षक से शिक्षा और प्रप्तव्य एक नहीं, अलग-अलग क्यों हो जाया कर्ता है? शिष्य की योग्यता, मांग और पात्रता के अनुरूप ही फल मिलता है, गुरु की पात्रता के अनुरूप नहीं। हां, यदि गुरु अनुकम्पा करके शिष्य की पात्रता को उच्चतम बना दे तो शिष्य गुरु का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकता है। तब ज्ञान के स्तर पर गुरु-शिष्य में कोई भेद नहीं रहता। उपाधि रूप से ही गुरु “गुरु” है और शिष्य एक “शिष्य” -उपदेशादयम वादो ज्ञाते द्वैतं न विद्यते।

डॉ जयप्रकाश तिवारी (94533 91020),
बलिया, उत्तर प्रदेश।

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