विशेष लेख : भगवान परशुराम जयंती पर सांस्कृतिक विमर्श (अक्षय तृतीया)

हम क्या थे? क्या हैं? और होंगे क्या? अब यही बैठ कर सोच रहाँ हूँ। शिक्षा में ह्रास, सुरक्षा की आस, बड़बोलेपन कुछ देख रहा हूं।। हर बात में पश्चिम देख रहा हूँ। गिरती नैतिकता, बढ़ती दानवता, नीचता, क्रूरता, पहलगाम का नग्न क्रूर बर्बरता देख रहा हूं। आज प्रतिगामी सोच वाले शुक्राचार्यों की भरमार तो सब और है, परन्तु प्रगतिशीलता के सांस्कृतिक मनीषी, पोषक वशिष्ठ, कोण, कौटिल्य, कबीर, नानक, विवेकानंद और उनके भी परमादर्श रहे राम, श्रीकृष्ण, परशुराम जैसों … का आभाव क्यों है? नैतिक मूल्यों में इतना ह्रास, इतनी गिरावट, ऐसा घोर पतन क्यों है? क्यों है? क्यों हो रहा है? और भौतिकता की आंधी में अध्यात्मिकता का यह उपहास क्यों है? इस प्रश्न से मुंह मोड़ा नहीं जा सकता।

कहीं पढ़ा था- “कोई भी गम मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, वही हारा जो लड़ा नहीं।” यह विचार नहीं, सिद्धांत है। हमें लड़नी है, एकसाथ दो लडाइयां; एक “सांस्कृतिक पुनरुत्थान” की और दूसरी “मधुमय संतुलित प्रकृति” की। उसके संरक्षण और अनुरक्षण की। मूल अधिकार यह हक़ है अपना, नहीं कोई यह भिक्षा है। “कंठ में शास्त्र” और “कर में शस्त्र” यह परशुराम जी की ही शिक्षा है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और श्रीकृष्ण का हृदय भी स्नेह का आगर, करुणा का सागर होते हुए भी मस्तिष्क विवेक से और हाथ शास्त्र से कभी खाली नहीं रहा।

सनातन संस्कृति में शास्त्र पर तो चर्चा बहुत मिलती है। कुछ चर्चा उनके अस्त्र पर भी आवश्यक है। अभी चर्चा भगवान परशुराम के सुप्रसिद्ध शस्त्र उनके “परशु” और शास्त्र पर। परशुराम जी का सन्देश स्पष्ट है- जब शास्त्र की मर्यादा, राष्ट्रीय स्वाभिमान, अपना अस्तित्व, अपनी संस्कृति और अपनी प्यारी प्रकृति हो संकट में, अन्याय के दमन और लोकमंगल हेतु सर्वथा उचित और शास्त्रानुमोदित है शस्त्र का सार्थक प्रयोग।

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परन्तु आज का शस्त्र मात्र “परशु” ही नहीं है, संवैधानिक अधिकार, वोट और सांस्कृतिक विमर्श है। तेजस्वी ऋषि विश्वामित्र ने स्वीकार किया था कभी – “क्षात्रशक्ति बलं नास्ति ब्रह्मतेजो बलं बलम”। सांस्कृतिक अधिकार में, दायित्वा निर्वहन में, उसी राष्ट्रीय उर्जा का प्रस्फुटन होना चाहिए। आज वोट के रूप में जो स्नेह आहुति राष्ट्र के “महाचुनाव यज्ञ” में किया गया था आज उसका सुपरिणाम दिख रहा है। पहलगाम के निन्दनीय, बर्बर, क्रूरतम कुकृत्य को सजा देने की दृढ़ इच्छा शक्ति दिख रही है। यह हमारे, आपके वैधानिक परशु “वोट शास्त्र” की ही शक्ति है।

इस प्रकार हम दावे के साथ कह सकते हैं कि “यह परशु” हमेशा शिरोच्छेदक ही नहीं होता, यह सर्जक, पोषक, हितकारी और न्यायकारी भी होता है। समाज और सामाजिक उपवन के अवांछित टहनियों को काट-छाँट कर, स्वस्थ शाखा, समर्थ वृक्ष के निर्माण में भी देखो ! इसका कितना सुंदर उपयोग है। आगे भी लोकमंगल की विवेकतुला पर ही परखकर अब करना है इसका प्रयोग और अनुप्रयोग।

परंपरागत इस शिक्षा का समुचित प्रयोग परशुराम जी ने खुलकर किया था और उसके बाद यह शिक्षा “छठे नानक” के रूप में रंग लाई, जब ‘मीरी’ और ‘पीरी’ (शस्त्र और शास्त्र) के युग्म रूप में, उन्होंने इसे अपनी जीवन संगिनी बनाई। आगे चलकर दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह जी ने किया इसे चरितार्थ और बना दिया जिसने एक नर को, शिष्य को, सिक्ख को एक ही साथ “संत”, “संत-सिपाही” और “सरदार”। आज पुन: इस विचार को नई धार देने की महती आवश्यकता है।

आध्यात्मिक सिद्धांत है- रम रहा जो जीव-जगत में, वही तो है- “राम”। साथ विवेकी परशु हो जब, जानो उसे ही तब- “परशुराम”। संस्कृति का था सजग प्रहरी वह परशुराम, “धनुष-भंग” सह सहता कैसे? किंतु देखा जब पूरी घटना, सारा विवरण और माना उत्तराधिकारी का अवतरण; तब क्षणमात्र भी ना किया विलम्ब, और सौप दिया सब भार ही उस राम को तत्क्षण लोकमंगाल के लिए। आज वर्तमान में “संघेशक्ति कलियुगे”, कोई विचार नहीं सच्चाई है, करनी होगी स्वीकार इसे, इसी में सबकी भलाई है।

हम मिल बैठ विचार करेंगे, हर संभव उपचार करेंगे, साथ जियेंगे, साथ मरेंगे, आज यही संकल्प करेंगे। कर उपाय हरसंभव संतुलित पारिस्थितिकी निर्माण करेंगे। अब तक चाहे जितना भी खोया, अबसे हम उत्कर्ष करेंगे। हां, अब से हम उत्कर्ष करेंगे। कैसे हो सिरमौर हमारा राष्ट्र, हमारी संस्कृति? अब इसका भी सुविवकी सुप्रबंधन करेंगे। आइए इस विंदु पर व्य पीएक, विस्तृत, विचार विमर्श करें, सनातन संस्कृति का सम्यक उत्कर्ष करें।

डॉ जयप्रकाश तिवारी
बलिया, उत्तर प्रदेश

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