तेलंगाना लेखक संघ: ‘तेलुगु भाषा पर अन्य भाषाओं का वर्चस्व’ सम्मेलन में ‘एक देश और एक भाषा’ का जमकर विरोध

हैदराबाद : तेलंगाना लेखक संघ की ओर से ‘तेलुगु भाषा और अन्य भाषाओं का वर्चस्व’ विषय पर शनिवार को राज्यस्तरीय सम्मेलन का आयोजन बागलिंगमपल्ली स्थित सुंदरय्या विज्ञान केंद्र में आयोजित किया गया। सम्मेलन में हैदराबाद लेखक संघ के अध्यक्ष कंदुकूरी श्रीरामुलू ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संघ के अध्यक्ष डॉ नालेश्वरम शंकरम ने की। संघ के प्रधान सचिव शंकर ने कार्यक्रम की भूमिका से अवगत कराया।

इनके अलावा ‘तेलंगाना भाषा और साहित्य प्रभाव’ विषय पर आचार्य राचपालेम चंद्रशेखर रेड्डी, ‘तेलुगु भाषा पर विभिन्न भाषाओं का वर्चस्व’ विषय पर प्रमुख भाषा विद्वान डॉ नलिमेल भास्कर, ‘तेलुगु भाषा और प्रसार माध्यमों का प्रभाव’ विषय पर तेलुगु दैनिक आंध्रज्योति के संपादक डॉ के श्रीनिवास और ‘भाषाओं का वर्चस्व, आंदोलन और तेलुगु भाषा’ विषय प्रमुख्य कवि डॉ नंदिनी सिधा रेड्डी ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये।

वक्ताओं ने कहा, “पहले से ही तेलंगाना और तेलंगाना भाषा पर अंग्रेजी, उर्दू, मराठी भाषाओं का वर्चस्व रहा है। इस प्रकार तेलंगाना के लोगों को और तेलंगाना की भाषा को अपमानित किया गया। इस अपमान को तेलंगाना के लोग और तेलंगाना के भाषा प्रेमियों ने बर्दाश्त नहीं किया। तेलंगाना और तेलंगाना की भाषा के लिए संघर्ष किया और उसे सम्मानजनक स्थान पर पहुंचाया।”

लेखकों ने कहा, “एक जमाने में तेलंगाना पर निजाम और तेलंगाना भाषा पर उर्दू का राज था। तब तेलुगु में सभा में भाषण देने भी नहीं दिया जाता था। अगर कोई वक्ता तेलुगु में भाषण दिया जाता तो उसे बीच में ही बोलने से रोक दिया जाता था। आजादी के बाद भी यहां पर निजाम शासन था यानी उर्दू का बोलबाला था। भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश बना तो आंध्र के लोगों ने तेलंगाना की भाषा को अपमानित किया। अनेक विद्वानों ने तेलंगाना की भाषा और आंध्र प्रदेश के वर्चस्व को बर्दाश्त नहीं किया। इसके वरोध में एक बड़ा आंदोलन किया।”

कवियोंने कहा, “आज हम तेलंगाना में है। फिर भी तेलंगाना की भाषा पर संकट के बादल छा रहे है। क्योंकि हर कोई अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई कर रहा है और अभिभावक भी अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा रहे हैं। अगर यह ऐसा ही चलता रहा तो तेलंगाना की भाषा का अस्तित्व ही मिट जाएगा। इसीलिए तेलंगाना और तेलंगाना की भाषा को बचाने के लिए अभी से आंदोलन की रूप रेखा तैयार कर लेनी चाहिए। साथ ही प्रस्ताव पारित करके आने वाले चुनाव में इस मुद्दे पर पार्टियों से उनकी राय जान लेनी चाहिए।

वक्ताओं ने कहा, “इस समय ‘एक देश और एक भाषा’ का नारा दिया जा रहा है। इसका मतलब है कि हिंदी देश की भाषा होगी और उसी भाषा में पढ़ाया और लिखाया जाएगा। यह नारा अंग्रेजी के साथ प्रांतीय (क्षेत्रीय) भाषा को दबाने की साजिश है। इसीलिए हमें इस साजिश से सावधान रहना चाहिए। इसके लिए जरूरत पढ़ी तो तेलंगाना के विद्वानों को एक बार फिर संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए। यह सब जानते है कि तेलंगाना में आंदोलनकारी कवि, लेखक, साहित्यकार और कलाकारों की कमी नहीं है। अपने सम्मान बचाने के लिए मर मिटने को भी तैयार रहते हैं। इसीलिए हर तरह के षड्यंत्र का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है और रहेगा।”

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