माओवादी आंदोलन में दरार, कहां हुई गलती और क्या है विकल्प!?

इस समय देश में माओवादी आंदोलन में आये दरार को लेकर गंभीर बहस जारी है। इसके अनेक कारण हैं। फिर भी सबसे मुख्य वजह माओवादी के पोलित ब्यूरो सदस्य मल्लोल वेणुगोपाल राव उर्फ अभय उर्फ सोनू और तेलंगाना आधिकारिक प्रवक्ता जगन और हाल ही मारे गये केंद्रीय पोलित ब्यूरो सदस्य कट्टा रामचंद्र रेड्डी उर्फ राजू दादा (67) और कडारी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा (63) माओवादी की ओर से मीडिया को जारी पत्र है। ध्यान रहे कि माओवादी केंद्रीय सचिव तिप्परी तिरुपति उर्फ देवजी है। हाल ही में इनको सचिव पर नियुक्त किया गया है।

सोनू के पत्र सारांश 60 साल के आंदोलन का विश्लेषण है अर्थात पार्टी की गलतियां, नुकसान, सशस्त्र संघर्ष अस्थायी रूप से स्थगित और अब तक जो कुछ हुआ उसके लिए जनता से माफी मांगी है। जबकि जगन, रामचंद्र रेड्डी और सत्यनारायण रेड्डी के नाम से जारी पत्र में सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने और के सोनू के पत्र व्यक्तिगत कहकर खारीज किया है। रामचंद्र रेड्डी और सत्यनारायण रेड्डी पोलित ब्यूरो सदस्य है और जगन तेलंगाना के सचिव व प्रवक्ता है। वैसे तो सोनू के विचार से मतभेद हो तो आपस में सुलझाया जा सकता था। मीडिया में आये इन पत्रों से लगता है कि वर्तमान में जारी दमन के चलते इन माओवादी नेताओं की बैठक नहीं हुई है।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ऑपरेशन कगार चलते माओवादी आंदोलन काफी दबाव में है। 31 मार्च 2026 तक सफाया करने की केंद्र सरकार चेतावनी के चलते माओवादियों की नींद हराम हो गई और दर-दर भटक रहे हैं। साथ ही सोनू के बयान से लगता है कि वह आत्मसमर्पण करके नये एजेंडे साथ जीवनधारा में आना चाहते है। इसी बीच केंद्रीय माओवादी ने सोनू को पार्टी के बहिष्कार कर दिया है। साथ ही चेतावनी दी है कि उससे हथियार पार्टी को सौंप दें। इसके अलावा हथियार छीन लेने का पार्टी कैडर को आदेश दिया है। सोचने की बात यह है कि केंद्रीय सदस्य कट्टा रामचंद्र रेड्डी और कडारी सत्यनारायण रेड्डी कथित मुठभेड़ में मौत हो गई। इन दोनों की मौत उनके ताजा पत्र जारी होने के कुछ ही पल में हो गई। इनकी मौत के बाद केंद्रीय समिति ने सोनू को पार्टी से बहिष्कार कर दिया।

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आरोप लगाया कि सोनू ने ही पुलिस को इन दोनों की सूचना दी हैं। इन घटनाओं से लगता है कि माओवादी आंदोलन पूरी तरह से बिखर गया है और अधिकतर माओवादी नेता पुलिस के घेराव में हैं। माओवादी आंदोलन में अब तक 18 हजार से अधिक लोग मारे गये हैं। इतना ही नहीं, इस साल यानी जनवरी 2025 से अब तक 378 माओवादी मारे गये हैं। कुछ भी फैसला लेने से पहले माओवादियों को इन मौत पर जवाब देना है। अर्थात इतने लोगों के बलिदान के लिए कौन जिम्मेदार है।

गौरतलब है कि रूस की अक्टूबर क्रांति (नवंबर 1917) व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने अस्थायी सरकार के खिलाफ एक तख्तापलट किया और सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था। इसी तरह चीन में माओ त्से तुंग की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति (1949) स्थापित हुई। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये दोनों क्रांति तानाशाही शासन के खिलाफ लड़ी गई और सफल हुई। बुद्धिजीवियों का मानना है कि अब तक किसी भी लोकतंत्र देश में सशस्त्र संघर्ष सफल नहीं हुई और न हो पाएगी। लोकतंत्र देश में संविधान के अनुसार, लोग सरकार को चुन सकते है। इसके बाद सत्ता पर बैठकर नेता देश की जनता के कल्याण के लिए अनेक प्रकार की योजनाओं को लागू कर सकते हैं। इसके लिए केवल एक अच्छे नेता का होना आवश्यक है। अपना सर्वस्व त्यागकर लोगों के लिए संघर्ष करने वाले माओवादी के सिवा और कौन अच्छा नेता हो सकता है! फिर भी यह विडंबना की बात है कि नक्सलवादी आंदोलन का सिद्धांत विदेशी नेताओं- माओ त्से तुंग, कार्ल मार्क्स, लेनिन और स्टालिन के मार्ग पर जारी है। सवाल उठता है कि इतने विशाल देश में माओवादी को अपना एक नेता क्या नहीं मिल पाया।

हां यह सच है कि पश्चिम बंगाल के नक्सबाड़ी पैदा हुआ संशस्त्र संघर्ष ने देश की जनता को जागरूक किया। जहां कहीं भी संविधान का उल्लंघन, अन्याय, अत्याचार हुआ, वहां माओवादी पहुंचे और लोगों के साथ खड़े रहे। उनको न्याय, हक और सम्मान दिलाया। सबसे बड़ी बात कुलीन व्यवस्था को धूल चटाई। 1980 से 1990 तक नक्सल आंदोलन आंध्र प्रदेश सहित देश के अनेक हिस्सों में चरम सीमा पर था। इसके बाद बढ़ते दमन के चलते माओवादियों से एक बड़ी भूल हो गई। संविधान के दायरे में लोगों के बीच रहकर जन आंदोलन चलाने बजाय वे जंगल में चले गये। इसके चलते नई भर्ती रुक गई। लोगों का समर्थन पहले जैसा नहीं मिल रहा है। एक जमाने में केंद्रीय पोलित ब्यूरो की संख्या 40 के आसपास थी। अब केवल दस तक रह गई है।

सोचने की बात यह है कि हमारे संविधान के अनुसार किसी को भी जान से मारने का अधिकार नहीं है। इतना ही नहीं आत्महत्या करना भी अपराध है। इतना सब कुछ स्पष्ट होने पर भी वर्तमान बीजेपी सरकार ऑपरेशन कगार के नाम पर माओवादी और मासूम लोगों को बेरहमी से मौत के घाट उतार रही है। अर्थात संविधान में निर्देशित जीने के अधिकार का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन कर रही है। यदि कोई इसके खिलाफ आवाज उठाता है तो, उसकी आवाज हमेशा के लिए बंद किया जा रहा है या जेलों में ठूंस दिया जा रहा है। केवल वे पांच साल के लिए सत्ता में आकर ये नेता राज करते हैं। सोचने की बात यह है कि क्या इसी प्रकार माओवादी संविधान के दायरे में आकर राज नहीं कर सकते है? देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्रांति स्थापित नहीं कर सकते हैं?

विश्लेषकों का मानना है कि माओवादी देश पर राज सकते है और अच्छा शासन दे सकते हैं। क्योंकि वे निस्वार्थी है। इस समय देश की सत्ता पर कौन और कैसे नेता बैठे हैं? यह सब देश की जनता को अच्छी तरह से मालूम है। नेताओं को सबक सिखाने को जनता तैयार है। केवल माओवादियों को संविधान के दायरे में लोगों के बीच आकर सत्ता में आना चाहिए। विश्लेषकों को विश्वास है कि देश की जनता माओवादी को सत्ता पर बिठाने के लिए तैयार है।

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