हिम्मत है तो ऑपरेशन कगार और माओवादी आंदोलन को इस नजरिए से भी देखिए, वर्ना…

इन दिनों माओवादी आंदोलन को लेकर मुख्य रूप से फूट को लेकर लगातार खबरें आ रही है। ये खबरें किधर से और कैसे आ रही है पता नहीं है। हालांकि एक बात स्पष्ट है कि माओवादी नेताओं के पत्र मीडिया में लगातार प्रकाशित और प्रसारित हो रहे हैं। इसी के आधार पर माओवादी आंदोलन में फूट का मुद्दा बनाकर और थोड़ा मसाला जोड़कर अपनी-अपनी सोच के हिसाब से कुछ मीडिया खबरें प्रकाशित और प्रसारित कर रही है।

लगभग छह दशक पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) से फूटे एक दल ने नक्सलबाड़ी में किसान आंदोलन की ज्वाला प्रज्वलित की थी। इस आंदोलन ने लोगों में नई चेतना भर दी। इसके बाद नक्सलवाड़ी आंदोलन नक्सलाइट के नाम से जाना जाने लगा। बदलते समय के साथ नक्सलाइट नेताओं की सोच भी बदलती गई। परिणामस्वरूप उनमें 17 फूट पड़ गये। इस समय सिर्फ एक माओवादी पार्टी ही सशस्त्र संघर्ष कर रही है। इस समय में उसमें भी दो विचारधारा के नेता हैं। एक सशस्त्र संघर्ष को जारी रखने और दूसरा वर्तमान स्थिति को देखते हुए सशस्त्र को स्थगित करने का ऐलान कर चुके हैं। अर्थात माओवादी पार्टी में भी फूट के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। फिर भी यह अंदर की बात है।

इसका मुख्य कारण माओवादी आंदोलन आज अपने अस्तित्व को एक निर्णायक मोड़ पर आकर ठहर गया है। केंद्रीय सरकार के दबाव के आगे माओवादी नेता अब असमंजस में हैं। सरकार ने ऐलान कर दिया है कि अगले साल मार्च तक माओवादी को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में गृहमंत्री अमितत शाह ने कहा कि 2025 में 270 माओवादी मारे गए हैं और 680 गिरफ्तार किए हैं। 1,225 अन्य ने आत्मसमर्पण कर दिया है। उन्होंने आगे कहा कि हमारी सरकार आत्मसमर्पण की नीति को बढ़ावा देती है। फिर भी गोली का जवाब गोली से ही दिया जाएगा। अमित शाह का यह बयान संविधान के जीन के अधिकार का उल्लंघन है। फिर भी इसके खिलाफ आवाज उठाने की किसी में हिम्मत नहीं है। यदि कोई आवाज उठाता है तो उसे जेल में बंद किया जा रहा है या मौत के घाट उतारा जा रहा है।

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इसी बीचते सीपीआई (माओवादी) के केंद्रीय समिति के प्रमुख्य और प्रवक्ता मल्लोजुला वेणुगोपाल राव (71) ने लगातार पत्र लिख रहे हैं। इन पत्रों में उन्होंने साफ कहा है कि अब पार्टी को बचाने के लिए सशस्त्र संघर्ष को स्थगित कर देनी चाहिए। मल्लोजुला के इस सुझाव को अन्य शीर्ष नेता मानने को तैयार नहीं है। तेलंगाना समिति के प्रवक्ता जगन ने एक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि पार्टी अभी भी सशस्त्र संघर्ष जारी रखने के अपने फैसले पर कायम है। इस पत्र के बाद राव ने दूसरा पत्र जारी किया। उसमें उन्होंने अपनी स्थिति की पुष्टि की और दावा किया कि उन्हें सीपीआई (माओवादी) के शीर्ष नेताओं और कार्यकर्ताओं का समर्थन हासिल है।

इसी क्रम में माओवादियों के बीच फूट के चलते भी केंद्रीय सशस्त्र बलों की ओर लगातार ऑपरेशन कगार जारी है। इसके कारण सशस्त्र गुरिल्ला घुटने टेकने पर मजबूर हो गए हैं। पूर्व महासचिव नम्बाला केशव राव उर्फ ​​बसवराज और केंद्रीय समिति के सदस्य कट्टा रामचंद्र रेड्डी, कडारी सत्यनारायण रेड्डी, गाजरला रवि, चलपति, सहदेव सोरेन, बालकृष्ण और नरसिम्हा और चलम सहित अधिकांश शीर्ष नेतृत्व की मौत हो गई है। बहुत सारे सशस्त्र माओवादी गुप्त ठिकानों बस्तर, दंडकारण्य और छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा से लगे इलाकों में छिप गये हैं। चारों ओर से एक दूसरे से कटे होने के कारण माओवादियों के पास हथियार और गोला-बारूद कम पड़ रहे हैं। क्योंकि उनका बड़ा जखीरा सुरक्षा बलों ने जब्त कर लिया है।

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इतना ही नहीं माओवादियों को अपने घटते हुए कार्यकर्ताओं को फिर से भर्ती करने के लिए भी कठिनाई हो रही है। हालांकि गैर-आदिवासी आबादी से भर्ती एक दशक से भी ज्यादा समय पहले ही बंद हो चुकी है। वर्तमान में आदिवासी युवा भी माओवादी पार्टी में शामिल होने से कतरा रहे हैं। इसका मुख्य कारण माओवादी विचारधारा की उन इलाकों में तेजी से हो रहे भौतिक और सामाजिक बदलावों के साथ तालमेल बिठाने में असमर्थता है जो कभी क्रांतिकारी जोश के केंद्र हुआ करते थे। आदिवासी समुदायों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त शिक्षा का भरपूर लाभ मिल रहा है। इससे उनके सशस्त्र संघर्ष में शामिल होने की संभावना कम हो रही है। आदिवासी युवाओं के पास मोबाइल फोन और इंटरनेट की सुविधा मिल रही है। इसके चलते अब माओवादी गुरिल्लाओं के कठोर जंगल के भूखे प्यासे जीवन में बिताने में कोई दिलचस्पी नहीं है।

दूसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दशकों तक सशस्त्र संघर्ष करने वाले शीर्ष माओवादी नेताओं में से अधिकांश बूढ़े हो गए हैं। कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। इसलिए मौजूदा परिस्थितियों में माओवादियों के लिए आत्मसमर्पण करना और सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं के साथ शांतिपूर्वक जीवन बिताना लाभदायक विकल्प प्रतीत होता है। कई शीर्ष नेताओं की पत्नियां और उनके साथी पहले ही आत्मसमर्पण कर चुके हैं। हालांकि राज्य और केंद्र सरकारें माओवादियों के आत्मसमर्पण के प्रस्तावों को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं।

गौरतलब है कि माओवादियों की सशस्त्र शाखा पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी का गठन 2000 में हुआ था और कोंडापल्ली सीतारामय्या की सीपीआई (एमएल) पीपुल्स वार और बिहार-बंगाल स्थित माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर सहित कई गुटों के विलय के बाद 2004 में सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ। 2000 के दशक के अंत में माओवादी आंदोलन ने 92,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैल गये और लगभग 180 जिलों को प्रभावित किया। लेकिन गृह मंत्रालय की सुरक्षा प्रवर्तन, समावेशी विकास और सामुदायिक सहभागिता के संयोजन से सरकार के प्रयासों ने तब से महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है। अप्रैल 2024 में वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या घटकर केवल 38 रह गई। इनमें से केवल छह जिलों को ही अधिक प्रभावित माना गया है। यहां अतिरिक्त संसाधनों को तैनात करने की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है।

नक्सलवादी (माओवादी) आंदोलन 18 मई, 1967 को उत्तरी पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में शुरू हुआ। जब लगभग 150 किसानों ने केवल दरांती, खंजर और भालों से लैस होकर जमींदारों की संपत्तियों पर हमला किया। भारी मात्रा में धान जब्त किया और जमीन पर कब्जा करना शुरू कर दिया। नक्सलबाड़ी विद्रोह के विचारक चारू मजूमदार एक कट्टर माकपा सदस्य थे। इस विद्रोह के कारण सशस्त्र संघर्ष का विरोध करने वाली माकपा में फूट पड़ गई। चारू मजूमदार और उनके सहयोगी कानू संन्याल सहित कई कम्युनिस्टों को पार्टी से निकाल दिया गया। उन्होंने 1969 में भाकपा (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का गठन किया। हालांकि, भाकपा (माले) और नक्सलवादियों (जिन्हें क्रांतिकारियों के नाम से जाना जाता था) पर सरकारी दमन ने मूल आंदोलन को लगभग समाप्त कर दिया। यह देख कई नेता भूमिगत हो गए। कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया या सुरक्षा बलों द्वारा पकड़ लिए गए या मारे गए। चारू मजूमदार स्वयं गिरफ्तार कर लिए गए और 1972 में पुलिस हिरासत में उनकी मौत हो गई।

हालांकि बंगाल में आंदोलन के थमने के बावजूद देश के कई हिस्सों में इसकी गूंज सुनाई दी। सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यह आंदोलन श्रीकाकुलम (आंध्र प्रदेश) में प्रवेश कर गया। एक ऐसा जिला जहां आदिवासी किसानों और जमींदारों के बीच तनाव लंबे समय से सुलग रहा था। अक्टूबर 1969 में ये आंदोलन चरम पर पहुंच गया। खेतीहर किसानों ने जमींदारों पर हमला किया। अनाज और जमीन पर कब्जा कर लिया और हथियारबंद होकर भाकपा (माले) के अलग-अलग समूहों में शामिल हो गए। अगले दशक में माओवादी आंदोलन भारत के मध्य भाग में फैल गया। इसने महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और झारखंड, ओडिशा, बिहार, अविभाजित आंध्र प्रदेश और बंगाल को प्रभावित किया। इस तरह सर्वहारा वर्ग के जीवन में नई रोशनी देने के संकल्प के साथ आगे बढ़ने वाला माओवादी आंदोलन इस तरह बिखर जाना खेदजनक है। क्योंकि माओवादी आंदोलन ने अन्याय के खिलाफ लड़ने और सिर उठाकर जीने का जन सामान्य को राह दिखाया। माओवादी के कारण गांवों में अन्याय, बलात्कार, लूटपाट, पुंजीपतियों, जमींदारों का दमन और अहंकार कुचल दिया गया। इसके बाद सर्वहारा और खेतीहर मजदूर वर्ग सिर उठाकर जीने लगे।

केंद्र सरकार के दावे के मुताबिक मार्च 2026 तक सभी माओवादी मार दिये जाएंगे अर्थात नक्सलाइट आंदोलन समाप्त किया जाएगा। इसके बाद स्वतंत्र भारत में स्वतंत्र लूटरें देश की संपदा को लूटकर ले जाने का रास्ता आसान हो जाएगा। यह सब जानते है कि देश के करोड़ों रुपये नीरव मोदी, विजय माल्या और अन्य ने किस तरह से लूटकर ले गये। इतना ही नहीं वर्तमान में बड़े-बड़े घोटालों में लिप्त और देश की संपदा लूटने वाले अनेक बड़े-बड़े नेता बीजेपी में शामिल हो गये और मजे ले रहे हैं। हाल ही में एक और बड़े नेता की 600 करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया गया। यह सब जनता का धन है। इसका बोझ जन सामान्य पर डाल दिया गया। यह सब देश की जनता जानती है। बैंक से कर्ज लेने के लिए किसान और आम नागरिक को अनेक प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है। मगर बिना किसी गैरंटी के कर्ज लेकर भाग जाने वालों को यह सरकार आदर और सम्मान के साथ विदेश भाग जाने की अनुमति देती और हर प्रकार से मदद करती है।

ध्यान रहे, हर दिन सूरज पूरब से उगता है और पश्चिम में डूबता है तथा अगले दिन नई रोशनी के साथ उदय होता है। यह परिवर्तन युग है। अनेक देशों में अनेक परिवर्तन हो चुके है। हाल ही में बांग्ला देश और नेपाल इसके ताजा उदाहरण हम सबने देखा है। जब लोगों की ज्वाला भड़क उठेगी, तब देश की संपदा लूटने वालों को भागने का रास्ता भी नहीं मिलेगा। माओवाद समाप्त होने पर भी उनके बलिदान को उतने आसान से सर्वहारा और खेतीहर मजदूर कभी नहीं भूल पाएंगे। क्योंकि उनके बलिदान की ज्वाला लोगों के दिलों में धधकती ही रहेगी। क्योंकि माओवादी आंदोलन ने समाज में नई चेतना जगाई है। वह चेतना बूझ जाएगी यह सोचना या कल्पना करना बहुत बड़ी भूल होगी। रूस के व्लादिमीर लेनिन कहा है कि एक कदम आगे और दो कदम पीछे हठना भी आंदोलन को शक्तिशाली बनाने की एक नीति है। अब देखना है कि मार्च 2026 के बाद ऑपरेशन कगार और माओवादी आंदोलन का प्रभाव देश पर कैसे डालता है। यह बात स्पष्ट है कि अन्याय खिलाफ लड़ने वाले का नाम माओवादी या नक्सलाइट होना जरूरी नहीं है। अन्याय के खिलाफ लड़कर जो व्यक्ति हंसते हुए मौत को गले लगाते हैं वे हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं और जिंदा रहेंगे। अगर कोई उसकी मौत पर खुशी मनाता है तो यह उसका भ्रम है कि उसने सूरज की रोशनी को हाथ से रोका है।

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