9 अगस्त को हैदराबाद आर्य सत्याग्रह दिवस मनाया जाता है। पहला हैदराबाद आर्य सत्याग्रह दिवस 1940 में मनाया गया था। जाति व समाज अपने पूर्वजों को विशेषकर अपने महाधनों (हुतात्माओं) को भुला देता है वह धर्म पथ से च्युत होने के उन्मुख होता है। कारण यह है कि मनुष्य अनुकरण शील प्राणी है। दूसरों को शुभ कर्म करता हुआ देख उसकी भी इच्छा उस कर्म को करने की हो जाती है। जिस समाज के हृदय पटल पर अपने पूर्व युगपुरुषों के यशस्वी सुकृत्यों की स्मृतियां अंकित रहती हैं, वह उत्तरोत्तर उन्नति पथ पर अग्रसर होती है। इसके विपरीत यदि समाज उन हुतात्माओं को भुला देता है तब वह आदर्शहीन हो जाता है। अन्त में परिणाम यह होता है कि जाति व समाज का इतिहास नष्ट हो जाता है और उसके साथ ही उनका गौरव, ज्ञान और सत्ता भी।
आओ हम उन हुतात्माओं को स्मरण करें जिन्होंने हैदराबाद निजाम राज्य के हिंदुओं पर, महिलाओं पर, मंदिरों – मठों पर अत्याचारों के विरुद्ध प्राण हथेली में रखकर स्वयं आए और निज़ाम शासन के क्रूर कार्यों के विरुद्ध आर्य सत्याग्रह को सफल बनाया, अपने प्राणों की आहुति दी। उन्हें शत-शत नमन कर आदरपूर्वक श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हैदराबाद आर्य सत्याग्रह बलिदान दिवस मनाते हैं।
त्याग जीवन का रस है। त्याग से ही जीवन बनता है, त्याग से ही बढ़ता है और त्याग से ही उज्जवल होता है। त्यागमय जीवन ही दूसरे जीवनों को उत्पन्न करते हैं। वे नर नारी धन्य है जो परिवार, जाति, देश, धर्म तथा संस्कृति के लिए आत्म – त्याग करते हैं। इस मिट्टी के शरीर को कुन्दन बनाना हो तो त्याग की भावना को अपनाना चाहिए। इनका त्याग ही सदैव नये जीवन का संचार करता रहेगा।
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हैदराबाद निजाम शासन काल 1938 में हिंदुओं पर अत्याचारों की सीमा लांघ दी। यहां की पीड़ित लोगों की नागरिक, धार्मिक व सांस्कृतिक अधिकारों के लिए धर्म युद्ध करना पड़ा। आर्यसमाज के युवा क्रांतिकारी नेता पंडित गंगाराम ने पंडित दत्तात्रेय प्रसाद वकील के साथ मिलकर आर्यन डिफेंस लीग (आर्य रक्षा समिति) की स्थापना की, जिसमें तत्कालीन साथियों में सर्व श्री राजपाल, प्रताप नारायण, बाल रेड्डी, सोहनलाल, विश्वनाथ आदि थे। आर्यन डिफेंस लीग ने हैदराबाद निजाम रियासत की स्तर पर सत्याग्रह शुरू कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय आर्यसमाज का इस युद्ध में झोंकने से पूर्व वे अभी कुछ और सोचना तथा देखना चाहते थे। पंडित दत्तात्रेय प्रसाद जी वकील ने कहा ” भाई तुम सोचते रहो, हम तो सत्याग्रह शुरू कर देते हैं। “
पहले आर्य सत्याग्रह जत्थे में हैदराबाद के पंडित देवीलाल और पंडित मुन्नालाल आदि का समावेश था। लगभग 22 सत्याग्रही जत्थे आर्यन डिफेंस लीग के नेतृत्व में जेलों में गये। इन जत्थों का नेतृत्व करने वाले सर्वाधिकारी – अधिनायकों के कुछ नाम इस प्रकार हैं। सर्वश्री देवीलाल आर्य (हैदराबाद), सी. नरहरि (हैदराबाद), दत्तात्रेय प्रसाद जी वकील (गुलबर्गा), शेषराव वाघमारे (निलंगा), दिगंबरराव शिवनगीकर (लातूर), शंकरराव पटेल (अंधोरी), शंकर देव कापसे (वडवल नागनाथ), निवर्ति रेड्डी (अहमदपुर), गणपतराव कथले (कलम), पंडित बंसीलाल जी व्यास (हैदराबाद), एडवोकेट दिगंबरराव लाठकर (नांदेड़), श्री राम चौधरी (मुखेड़) आदि। हैदराबाद निजाम रियासत के लगभग पांच हजार सत्याग्रहियों ने सत्याग्रह में भाग लिया।
सोलापुर में लोक नायक अणे की अध्यक्षता में 1938 आर्य महासम्मेलन में नेताओं ने हैदराबाद सत्याग्रह को अखिल भारतीय रूप देने का निश्चय किया। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा का नेतृत्व श्री घनश्याम सिंह गुप्त और श्री लाला देशबंधु गुप्त कर रहे थे, जो कांग्रेस के भी जाने-माने नेता थे। गांधी जी ने इन दोनों नेताओं को परामर्श दिया कि आर्य समाज अपना अलग से सत्याग्रह ना करके कांग्रेस के झंडे तले आंदोलन जारी रखें। इस विषय को आर्य सम्मेलन की विषय निर्वाचन समिति में रखा गया। समिति के सभी सदस्य इसे स्वीकार करने का निर्णय लेने वाले थे कि कुंवर चांदकरण शारदा जी ने कहा कि हमने कुछ प्रमुख नेताओं जैसे वीर सावरकर आदि को भी आमंत्रित किया है, उनकी राय भी मालूम करना चाहिए, तब वीर सावरकर जी से पूछा गया, उन्होंने कहा : ‘ *मैं समझता था कि यहां बैठे यह बड़े लोग दयानन्द के भक्त हैं। दयानन्द के समान सत्य के पुजारी हैं, दयानन्द के समान सत्य की रक्षा करने के लिए सब कुछ त्यागने को तैयार हैं। पर मुझे तो एक भी ऐसा नहीं दीख रहा है आदि। ‘ यह बातें सुनकर सबके विचार बदले और एकमत से सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि आर्य सत्याग्रह चालू रहेगा।
सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने सत्याग्रह के लिए स्वामी स्वतंत्रतानन्द जी महाराज को फील्ड मार्शल बनाया। महात्मा नारायण स्वामी प्रथम सर्वाधिकारी बनकर सत्याग्रह को निकले। सार्वदेशिक प्रतिनिधि सभा के तत्वावधान में देश-विदेश के आर्यसमाजों से दर्जनों जत्थे आये। इन जत्थों का नेतृत्व करने वाले कतिपय अधिनायकों के उल्लेखनीय नाम हैं – सर्वश्री महात्मा नारायण स्वामी जी, कुंवर चांदकरण शारदा, खुशहालचंद ‘खुरसंद,’ राजगुरु धुरेन्द्र शास्त्री, पं. वेदव्रत वानप्रस्थी, महाशय कृष्ण, ज्ञानेन्द्र ‘सिद्धांतभूषण’। आठवें अधिनायक बैरिस्टर विनायकराव विद्यालंकार 1500 सत्याग्रहियों के साथ अहमदनगर के केन्द्रीय शिविर में सत्याग्रह के लिए कूच करने के लिए तैयार थे कि हैदराबाद निजाम सरकार ने आर्यसमाज की मांगे स्वीकार कर लीं। निजाम रियासत से बाहर के सत्याग्रही लगभग बारह हजार से भी अधिक आर्य सत्याग्रहियों ने हैदराबाद आर्य सत्याग्रह में भाग लिया।
महात्मा नारायणस्वामी जी ने स्वामी स्वतंत्रतानन्द जी महाराज द्वारा इस धर्म – युद्ध की सफलता के बारे में लिखा है :-
” सत्याग्रह का संचालन इतना उत्तमता से हुआ कि इस देश ही में सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित नहीं हुआ, अपितु इंग्लैंड में भी उसका प्रभाव पहुंचा और चार बार पार्लियामेंट में प्रश्न भी पूछे गए।”
देश के एक सुप्रसिद्ध पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी, आर्य साहित्यकार पं क्षितिज कुमार विद्यालंकर जी ने अपनी पुस्तक ‘ निजाम की जेल में ‘ आर्य सत्याग्रह हैदराबाद सन 1939 में अपने जेल जाने की कहानी में श्री गंगाराम जी द्वारा अत्यन्त सूझबूझ से जोखिम उठाकर क्षितीश जी के जत्थे को सत्याग्रह करने तथा जेल पहुंचाने का पेचदार और लम्बा रोचक वृत्तान्त दिया है। पंडित गंगाराम लौह पुरुष के नयनों में समा गये। इनको गुणियों के पारखी स्वामी स्वतंत्रतानन्द जी ने अत्यन्त विकट कार्य के लिए चुना, यह उनके जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है। एक अत्यन्त महत्वपूर्ण, कठिन और विकट कार्य सौंपा कि अपने राज्य के आर्यों में से सत्याग्रहियों की लगातार भर्ती करनी है और यह कार्य करते हुए निज़ाम की कूटिल क्रूर सरकार की धर पकड़ से भी स्वयं को बचाना है। इतिहास साक्षी है कि सत्याग्रह आन्दोलन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण योद्धाओं में से एक गंगाराम जी ने अत्यन्त सतर्कता, सजगता व दूरदर्शिता से स्वामी जी महाराज द्वारा सौंपे गये सभी कार्य अत्यन्त नीतिमत्ता व कुशलता से करके दिखाये।
ऐसे अभूतपूर्व सत्याग्रह में दर्जनों वीरों ने बलिदान दिया। बच्चों और युवकों ने धर्म रक्षा के लिए सीस कटाए, स्वामी कल्याणानन्द जी तथा स्वामी सत्यानन्द जी सरीखे वृद्धों ने भी अपने जीवन भेंट चढ़ाकर आर्यसमाज का सिर ऊंचा कर दिया। आर्यसमाज के साधुओं, विद्वानों, गृहस्थियों और गुरुकुल के ब्रह्मचारियों में जेल जाने, कष्ट सहने व सिर कटाने की इक होड़ – सी लगी हुई थी। कवि ने ठीक ही लिखा था –
तेरे दीवाने जिस घड़ी दक्षिण दिशा को चल दिए ।
हैरत में लोग रह गये दुनिया का दिल दहला दिया ।।
आओ, हम हैदराबाद आर्य बलिदान दिवस पर, उन हुतात्माओं और सत्याग्रह में परोक्ष व अपरोक्ष रूप से भाग लेते हुए इस धरती को पवित्र किया उनको शत-शत प्रणाम करते हैं जिनके बलिदानो से आप और हम आज स्वतन्त्र रूप से जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
– भक्तराम
अध्यक्ष स्वतंत्रता सेनानी पंडित गंगाराम स्मारक मंच
‘सुख विहार’ 2 – 2 – 647/A/51,
साईं बाबा नगर, शिवम् रोड, बाग अम्बरपेट,
हैदराबाद – 500013
मोबाइल 9849095150
