दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र देश में 30 अक्टूबर को तेलंगाना में करीमनगर जिले के हुजूराबाद निर्वाचन क्षेत्र के लिए उपचुनाव होगा। चुनाव में किसी भी एक पार्टी की जीत होगी। मगर इस चुनाव को लोकतंत्र की हार ही नहीं बल्कि दिनदहाड़े हत्या मानी जाएगी। हमारे निष्पक्ष चुनाव की नीति की यहां पर धज्जियां उड़ा दी गई है। खुल्लमखुल्ला पैसे बांटे जा रहे हैं। जिनको पैसे नहीं मिला है, वो वोटर रकम की मांग करते हुए सड़कों और नेताओं के मकानों के सामने धरना और आंदोलन कर रहे हैं। क्या यह सब किसी को दिखाई नहीं दे रहा है? यदि दिखाई दे रहा है तो आंखें बंद करके क्यों बैठे हैं? अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश के भविष्य के लिए जिम्मेदार कौन है?
यह सभी जानते और मानते है कि हुजूराबाद उपचुनाव लोकतंत्र की रक्षा के लिए नहीं हो रहा है। यह उपचुनाव भ्रष्टाचार के बंटवारे को लेकर उठे विवाद के बल पर हो रहा है। इसके लिए सरकारी यानी लोगों का पैसा बर्बाद हो रहा है। साथ ही भ्रष्टाचार से कमाई गई रकम को लिफाफों में बंद करके लोगों में बांटा जा रहा है। देश के इतिहास में इतने बड़े ‘भ्रष्टाचार’ चुनाव कभी नहीं हुआ हैं। आचार संहिता के अनुसार, स्थानीय नेताओं को छोड़कर सभी को निर्वाचन क्षेत्र छोड़कर चले जाना चाहिए। मगर अनेक नेता निर्वाचन क्षेत्र के सीमाओं के गांवों में डेरा डालकर ‘जरूरी’ चीजों की आपूर्ति कर रहे हैं।

तेलंगाना सरकार ने भी उपचुनाव के संकेत मिलते ही दलित बंधु के नाम पर लाखों रुपये बांटना शुरू किया है। इतना ही नहीं अनेक योजनाओं को लागू किया है। यह सब देखकर निर्वाचन क्षेत्र के लोग मान रहे है कि हमारी तो किस्मत ही खुल गई हैं। बाकी तेलंगाना के लोग पछता रहे है कि हमारा जन्म हुजूराबाद निर्वाचन क्षेत्र में क्यों नहीं हुआ है?

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि हुजूराबाद के उपचुनाव में धड़ले से पैसा बांटा गया और बांटा जा रहा है। यह हमारे सबसे बड़े लोकतंत्र देश के लिए घातक है। लोकतंत्र रक्षा करनी है तो चुनाव आयोग तो तुरंत हुजूराबाद उपचुनाव को स्थगित कर देना चाहिए। साथ ही दलित बंधु योजना से लेकर हुजूराबाद उपचुनाव के दौरान लिफाफों में बांटे गये रकम के मुद्दों की सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज से समग्र जांच की जाये। ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो जाये।

गौरतलब है कि तेलंगाना के गठन अनेक बलिदानों से साकार हुआ है। बलिदानों से हासिल वर्तमान तेलंगाना की शायद किसी ने कल्पना तक नहीं की है। तेलंगाना के गठन निल्लु, निधिलु और नियमाकुलु (जल, निधि और नौकरी) के लिए लड़ा गया था। तेलंगाना गठन के बाद मुख्यमंत्री केसीआर ने तेलंगाना के शहीदों के अरमानों पर पूरा पानी फेर दिया है।
तेलंगाना में जल विवाद जैसा का वैसा पड़ा है। निधियों का खुल्लम-खुल्ला दुरुपयोग हो रहा है। इसका एक उदाहरण कालेश्वरम परियोजना है। नये पदों का तो सृजन नहीं किया गया। बल्कि रिक्त पदों की भर्ती भी करने की सरकार को फूर्सत नहीं हैं। इसके कारण ढलती उम्र के चलते पढ़े-लिखे युवकों की डिग्रियां केवल दिखावा बन कर रह गई है। सरकारी शिक्षा को तहस नहस किया जा रहा है। सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा देखी नहीं जाती। शहरों में गंदगी का बोलबाला है। कुल मिलाकर तेलंगाना की लोगों की अपेक्षाओं पर यह सरकार खरी नहीं उतरी है।
नोट- पाठक भी हुजूराबाद उपचुनाव पर सारगर्भित लेख फोटो के साथ शाम तक भेज सकते हैं।