विशेष लेख – गुरु गोबिंद सिंह जयंती: पुण्य स्मरण

दशमेश गुरु गोविंद सिंह का जन्म गुरु शिष्य परंपरा में सनातन धर्म के रक्षार्थ हुआ है। उनपर उनके पिता गुरु तेगबहादुर की जी की शिक्षाओं का बहुत अधिक प्रभाव है था। नवमगुरु तेग बहादुर जी का सिद्धांत था है “भय काहू को देत नहीं, नहिं भय मानत काहू”। अपने इसी उद्देश्य और गीता के “स्वधर्मे निधनं शेष” को चरितार्थ करते हुए शीश गंज में अपना शीश तो दिया किंतु सी तक न किया था। ऐसे महान गुरु गोविंद सिंह की जयंती का एक बार फिर 27 दिसंबर को मनाई जाएगी। सिखों के अंतिम गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी।

इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए दशम गुरु गोबिंद सिंह जी अपने पूर्वजन्म का वृत्तांत ‘बचित्र नाटक’ में इस प्रकार बतलाते हैं-

अब मैं अपनी कथा बखानो।
तप साधत जिह बिध मुह आनो॥
हेमकुंड परबत है जहां,
सपतसृंग सोभित है तहां ॥
सपतसृंग तिह नाम कहावा।
पांडराज जह जोग कमावा ॥
तह हम अधिक तपसया साधी।
महाकाल कालका अराधी ॥
इह बिध करत तपसिआ भयो।
द्वै ते एक रूप ह्वै गयो” ॥

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अर्थात अब मैं अपनी कथा बताता हूँ। जहाँ हेमकुंड पर्वत (अब हेमकुंड साहिब तीर्थ) है और सात शिखर शोभित हैं, सप्तश्रृंग (जिसका) नाम है और जहां पाण्डवराज ने योग साधना की थी, वहाँ पर मैंने घोर तप किया। महाकाल और काली की आराधना की। इस विधि से तपस्या करते हुए दो (द्वैत) से एक रूप हो गया, ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ। आगे वह कहते है कि ईश्वरीय प्रेरणा से उन्होंने (यह) जन्म लिया।

अपने जीवन का उद्देश्य साधुओं का परित्राण, दुष्टों का विनाश और धर्म रक्षा बतलाते हुए वह कहते हैं-

हम इह काज जगत को आए।
धरम हेतु गुरुदेव पठाए॥
जहां-जहां तुम धरम बिथारो।
दुसट दोखियनि पकरि पछारो॥
याही काज धरा हम जनमं।
समझ लेहु साधू सब मनमं॥
धरम चलावन संत उबारन।
दुसट सभन को मूल उपारन॥

यह उद्देश्य नया नहीं, सनातनी है, परंपरागत है। स्मरण कीजिए श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरितमानस और दुर्गासप्तशती का इन उद्घोष को।

श्रीमद्भगवद्गीता:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

रामचरितमानस:

“जब जब होई धरम कै हानी, बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।
तब तब धरि प्रभु विविध शरीरा, हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।”

दुर्गासप्तशती:

इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यती।
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम।।

इसका भावार्थ है कि जब – जब दानवों के द्वारा भविष्य में कोई बाधा की जाएगी तब तब मैं अवतार लेकर रक्षा करुंगी।

अपने अवतरण के उद्देश्य को प्रकट करने के पश्चात इसकी पूर्ण करने के लिए देवी से वरदान मांगते हैं, प्रार्थना करते हैं –

“देह शिवा बरु मोहि इहै सुभ करमन ते कबहूं न टरों।
न डरों अरि सो जब जाइ लरों निसचै करि अपुनी जीत करों ॥
अरु सिख हों आपने ही मन कौ इह लालच हउ गुन तउ उचरों।
जब आव की अउध निदान बनै अति ही रन मै तब जूझ मरों” ॥

इतिहास साक्षी है दशमेश ने इसे प्रमाणित किया। ऐसे मां भारती के वीर सपूत, अमर राष्ट्रभक्त, प्रखर संत सिपाही को उनके जन्म दिवस पर कोटिश: नमन।

डॉ जयप्रकाश तिवारी (94533 91020)
बलिया/लखनऊ, उत्तर प्रदेश।

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