Article: क्रांतिकारी कवि, गायक और अभिनेता गद्दर का निधन देश के लिए अपूरणीय क्षति है

क्रांतिकारी कवि, गायक, अभिनेता और जन नाट्य मंडली के संस्थापक गुम्मडी विट्ठल राव उर्फ गद्दर (74) का छह अगस्त को निधन हो गया। गद्दर का निधन केवल तेलंगाना ही नहीं बल्कि देश के लिए अपूरणीय क्षति है। गद्दर के नेतृत्व में माओवादी आंदोलन के विकास के लिए किये गये सेवाओं को स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। उनके लिखे और गाये गये गीत हमेशा लोगों के दिलों में बसे रहेंगे। गद्दर का जन्म 1949 में मेदक जिले के तूप्रान में एक दलित परिवार में हुआ था।

छच्चम्मा और शेषय्या का बेटा ही गद्दर है। उनकी प्राथमिक शिक्षा तूप्रान में और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हैदराबाद में हुई। बैंक की नौकरी मिलते ही शादी कर ली। उनकी पत्नी का नाम विमला है। इस दंपत्ति को तीन संतान हैं। दो बेटे- सूर्यडू व चंद्रडू और एक बेटी- वेन्नेला है। चंद्रडू का 2003 में बीमारी के कारण निधन हो गया।

गद्दर ने सामंतवाद विरोधी संघर्षों के संदर्भ में नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम की भावनाओं को अपने गीतों, नाटकों, बुर्रा कथाओं और ओग्गु कहानियों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया। परिणास्वरूप में अनेक युवक, युवतियां, शिक्षक, इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, श्रमिक, खेतीहर मजदूर, सर्वहारा वर्ग नक्सली (माओवादी) आंदोलन शामिल होते गये और अब भी हो रहे हैं, मगर पहले जैसा नहीं है। क्योंकि अनेक माओवादी कथित मुठभेड़ों में मारे गये, अनेक माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया और कुछ माओवादी नेताओं की बीमारियों के चलते मौत हो गई।

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नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम संघर्षों से प्रेरित होकर उत्पीड़ित लोगों को आंदोलन में एकजुट करने के लिए सीपीआई (एमएल) पीपुल्सवार (माओवादी) ने एक सांस्कृतिक समूह का गठन किया। प्रारंभ में इसका निर्माण कला प्रेमियों के साथ किया। बाद में जन नाट्य मंडली (1972 ) का गठन किया। जन नाट्य मंडली के गठन में गद्दर की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। गद्दर का क्रांतिकारी आंदोलन का सफर 1972 से 2012 तक रहा है। गद्दर चार दशकों तक पीड़ित लोगों के साथ खड़े रहे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) पार्टी के एक सदस्य के रूप में गद्दर ने संस्कृति क्षेत्र में कार्य करते हुए क्रांतिकारी आंदोलन के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

गद्दर 1972 से 2012 तक माओवादी पार्टी के सदस्य भी रहे हैं। उन्होंने जन नाट्य मंडली के माध्यम से नाटकों, बुर्रा कथाओं और ओग्गु कहानियों के माध्यम से लोगों को लोक साहित्य के प्रति जागरूक किया। इस दौरान गद्दर ने कई गीत लिखे और गाये हैं। कुछ समय के लिए AILRC के सचिव के रूप में भी कार्य किया। उन्होंने शुरुआती दिनों से लेकर फिर से शुरू हुए तेलंगाना के लोकतांत्रिक आंदोलनों में भाग लिया। गद्दर ने फिर से शुरू हुए आंदोलन में तेलंगाना प्रजा फ्रंट के अध्यक्ष के रूप में काम किया। उन्होंने तेलंगाना आंदोलन के लिए भी गीत लिखे है। यह गीत काफी लोकप्रिय हो गये।

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लुटेरे शासकों के कथित और फर्जी मुठभेड़ों में मारे गए नक्सलियों की लाशों को उनके परिजनों को सौंपने पर रोक लगाई थी। ऐसे समय में गद्दर ने नक्सलियों के शवों को उनके परिजनों को सौंपने के लिए किये गये आंदोलन का नेतृत्व किया। इस आंदोलन में सफलता भी मिली। इसके साथ ही गद्दर ने 80 के दशक में चार साल तक भूमिगत रहे। सांस्कृतिक क्षेत्र की आवश्यकता को महसूस करते हुए माओवादी पार्टी ने गद्दर को बाहर भेज दिया और जन नाट्य मंडली को विकसित किया। गद्दर के खिलाफ लगभग पचास मामले लंबित होने की चर्चा है।

चंद्रबाबू नायुडू के शासनकाल के दौरान जब राज्य में तेलुगु देशम पार्टी सत्ता में थी, तब माओवादी आंदोलन को खत्म करने के लिए क्रांतिकारी विरोधी ताकतों के साथ मिलकर ‘काला दल’ गिरोह का गठन किया गया था। सार्वजनिक संगठनों में सक्रिय रूप से काम कर रहे कई क्रांतिकारियों की ‘काला दल’ ने बेरहमी से हत्या कर दी। उसी के अंतर्गत 1997 में गद्दर पर इसी काला दल गिरोह और पुलिस ने मिलकर फायरिंग की। उनके शरीर में पांच गोलियां घुस गई। फिर भी गद्दर हादसे से गद्दर बाल-बाल बच गये। एक गोली उनके शरीर में ही रह गई थी। इसे निकाला नहीं गया। क्योंकि गोली निकालने पर उनके जान को खतरा था।

तेलंगाना में जन नाट्य मंडली के गीतों से कई क्रांतिकारी, युवा, महिलाओं और पुरुषों को मंत्रमुग्ध करने वाले गद्दर ने पार्टी के नियमों के खिलाफ सत्तारूढ़ दलों से मुलाकात की। इसके चलते माओवादी पार्टी ने कारण बताओ जारी किया। इसके चलते गद्दर ने 2012 में पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। पार्टी ने गद्दर के इस्तीफे को मंजूर कर लिया। 2012 तक उत्पीड़ित लोगों के पक्ष में खड़े रहने वाले गद्दर ने बाद में बुर्जुआ संसद का रास्ता चुना। इस दौरान गद्दर ने कांग्रेस, बीजेपी, बीआरएस और अन्य पार्टी के नेताओं से मिलते रहे है। लोकतंत्र विश्वास नहीं रखने वाले गद्दर ने हाल ही में वोट के समर्थन में एक फिल्म के गीत भी लिखा है। यह गीत काफी प्रसिद्ध भी हुआ।

हाल ही में गद्दर ने तेलंगाना प्रजा फ्रंट नई पार्टी गठन के चुनाव आयोग के पास आवेदन भी किया था। गद्दर को ‘ओरे रिक्षा’ फिल्म के ‘मल्लेतीगा कु पंदिरी वोले…’ गीत के लिए और ‘जय बोलो तेलंगाना…’ गायन के लिए नंदी अवार्ड मिले हैं। इसके अलावा ‘मा भूमि’ फिल्म के लिए लिखे, गाये और अभिनय किया गया गीत काफी प्रसिद्ध हुआ। हमेशा लोगों के बीच गीत गुनगुनाते और गाते रहने वाले गद्दर के अंतिम संस्कार में हजारों की संख्या में लोगों ने अश्रू नयनों से विदाई दी। ऐसे महान क्रांतिकारी कलाकार को उनके महाबोधि स्कूल परिसर में बौद्धिक धर्म के परंपरा के अनुसार दफनाया गया।

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