अहिल्या शब्द का अर्थ- ‘कुरूपता के बिना’, ‘आदर्श’ है। डॉ. अहिल्या मिश्र नाम के अनुसार ही बिना किसी दिखावे के परिवार, समाज, हैदराबाद शहर, भारत देश, साहित्य समाज आदि सभी के लिए आदर्श थीं।
मैंने उनको देखा और सुना था कई बार लेकिन आमने-सामने बैठकर बात करने का अवसर मिला था। हैदराबाद शहर में 31 दिसंबर को श्रीलाल शुक्ल की जयंती के अवसर पर आयोजित होनेवाली एक संगोष्ठी में। जहाँ मैं मुख्य वक्ता के रूप में पहुँची थी। स्वभावानुसार मैं पीछे एक कुर्सी में बैठी हुई थी। उन्होंने मुझे बुलाया ठीक अपने पास में बिठा लिया। वार्तालाप करना उन्होंने ही शुरू किया। वह दिन और आज का दिन मैं उनके वृहत साहित्यिक परिवार की सदस्य बन गई।
अहिल्या मैम अधिकार भाव से मुझे याद करती थीं। ‘अरे अपनी सुपर्णा है न! बुला लो। आलेख पढ़ देगी, परिचय पढ़ देगी’। यह कहना नहीं भूलती थीं कि, ‘सुपर्णा बिल्कुल समय पर आ जाती है’। ऐसे मुझे दो-चार लोग ही याद करते हैं। उनमें से एक थीं डॉ. अहिल्या मिश्र। ‘थी’ यह शब्द लिखते समय हृदय में बेचैनी है। कोई इस संसार में रहने नहीं आया है। यह जानकार भी सब अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए धन-संपत्ति ऐसे जमा करते हैं जैसे अमरत्व का वरदान लेकर आए हैं।
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आपकी जमा की हुई संपत्ति ‘कादंबनी क्लब’, ‘पुष्पक पत्रिका’, अलमारी भर के रखी हुई पुस्तकें केवल आपके परिवार के लिए नहीं आपके साहित्यिक परिवार के लिए भी अनमोल धन है। माँ, सास, दादी, शिक्षिका, कवयित्री, दीदी, बड़का दाई और मेरी अहिल्या मैम के रूप में आप स्त्री सशक्तिकरण की ज्वलंत उदाहरण हैं।
अब तक आप ‘वट वृक्ष की छाँव’ बनकर इस लौकिक संसार में अपनी छटा बिखेर रहीं थीं। अवश्य ही अब स्वर्ग में साहित्यिक गपशप शुरू हो चुकी है और हम आपको धरती पर खोज ‘MISS’ कर रहें है। आप से फिर किसी जन्म कहीं मिलना हो यही प्रार्थना।
आपकी चिरपरिचित

सुपर्णा
