हैदराबाद : युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच (पंजीकृत न्यास) आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा की 22वीं संगोष्ठी 14 दिसम्बर को आयोजित की गई। डॉ. रमा द्विवेदी (अध्यक्ष, आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना राज्य शाखा) एवं महासचिव सरिता दीक्षित ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि यह कार्यक्रम युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच, उत्तर प्रदेश राज्य शाखा के अध्यक्ष राजेश सिंह ‘श्रेयस’ (लखनऊ) की अध्यक्षता में संपन्न हुई। मुख्य वक्ता डॉ सुषमा देवी (असोसिएट प्रोफेसर, बद्रुका कॉलज, हैदराबाद) पुस्तक के लेखक रामकिशोर उपाध्याय (राष्ट्रीय अध्यक्ष, युवा उत्कर्ष, दिल्ली) प्रदेश अध्यक्ष डॉ रमा द्विवेदी मंचासीन हुए। मुख्य वक्ता डॉ सुषमा देवी का परिचय तृप्ति मिश्रा (सह संयोजिका) ने दिया। अध्यक्ष राजेश सिंह श्रेयस एवं रामकिशोर का परिचय शिल्पी भटनागर (संगोष्ठी संयोजिका) ने दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ स्वाति गुप्ता (तकनीकी सहयोगी) द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना के साथ हुआ। तत्पश्चात प्रदेश इकाई की अध्यक्षा डॉ रमा द्विवेदी ने सम्माननीय अतिथियों का शब्द पुष्पों से स्वागत किया एवं ‘लालटेन’ कहानी संग्रह के कथ्य का विषय प्रवर्तन किया। मुख्य वक्ता डॉ सुषमा देवी ने ‘लालटेन ‘कहानी संग्रह के कथ्य पर प्रकाश डालते हुए कहा, ”रामकिशोर उपाध्याय का कहानी-संग्रह “लालटेन” हिन्दी कथा-साहित्य की उस परंपरा को आगे बढ़ाता है, जो गाँव, ग़रीबी, विस्थापन, प्रेम और मानवीय जिजीविषा को केंद्र में रखती है। प्रेमचंद, रेणु और संजीव की यथार्थवादी संवेदना से जुड़ते हुए यह संग्रह समकालीन समाज के नैतिक संकट, टूटते रिश्तों और बदलती सामाजिक चेतना को गहराई से चित्रित करता है।
“लालटेन” केवल एक प्रकाश-स्रोत नहीं, बल्कि अँधेरे समय में आशा, संघर्ष और मनुष्यता का प्रतीक है। संग्रह की कहानियाँ प्रेम को जीवन की सृजनात्मक शक्ति मानती हैं, पर उसे कर्तव्य, नैतिकता और सामाजिक मर्यादा के साथ संतुलित करती हैं। ‘लकी चार्म’, ‘आख़िरी एस.एम.एस.’ और ‘वो एक रात’ जैसी कहानियों में प्रेम, विवाह और दायित्व के बीच के द्वंद्व को संवेदनशील ढंग से उभारा गया है। इस संग्रह की स्त्री-पात्र सहानुभूति की वस्तु नहीं, बल्कि संघर्षशील चेतना की प्रतिनिधि हैं। वे अपने अस्तित्व, सम्मान और निर्णय के लिए समाज से संवाद करती हैं। ‘यहाँ कमल खिला करते थे’ और ‘जस की तस धर दीनी।’ जैसी कहानियाँ प्रेम, ईर्ष्या, धोखे और मूल्यों के टकराव को प्रभावी रूप में सामने लाती हैं।
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रामकिशोर उपाध्याय की भाषा सहज, सधी हुई और लोक-संस्कृति से जुड़ी है। संवाद जीवंत हैं और प्रतीक—जैसे लालटेन, अँधेरा, मिट्टी और रास्ता—कथाओं को गहराई प्रदान करते हैं। लेखक का दृष्टिकोण मानवतावादी है, वे समाज की विसंगतियों को केवल उजागर नहीं करते, बल्कि उनके भीतर छिपी करुणा और आशा को भी रेखांकित करते हैं। समग्रतः “लालटेन” समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य की एक महत्वपूर्ण कृति है, जो यह विश्वास जगाती है कि मूल्य-संकट के दौर में भी मनुष्य के भीतर यदि लालटेन-सा उजाला जीवित है, तो अँधेरा कभी अंतिम सत्य नहीं बन सकता।
‘लालटेन’ कहानी संग्रह के लेखक रामकिशोर उपाध्याय ने कृति की रचना प्रक्रिया पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा, ”जीवन के विविध अनुभव ही हमें लिखने के प्रेरित करते है। विषय अपने ही आस पास बिखरे पड़े होते है किन्तु उनका चयन हमारी सूक्ष्म दृष्टि पर निर्भर करता है। उन्होंने डॉ सुषमा देवी के शानदार एवं सार्थक वक्तव्य की सराहना की और उनका आभार ज्ञापित किया।”
अध्यक्षीय उद्बोधन में राजेश सिंह श्रेयस ने कहा, ”अपनी सामाजिक साहित्यिक यात्रा के दौरान हर मोड़ पर टकराने वाले व्यक्तित्व को पात्र के रूप में रखकर कहानियों को धर देने वाले विद्वान साहित्यकार की कलम कब कहानी को कहां मोड़ दे दे, कहा नहीं जा सकता। मैंने भी श्रीराम किशोर उपाध्याय की कहानी को पढ़ने की कोशिश किया और जब जब मेरी संवेदना कहानी के उस अंश तक गई, जो मेरे मन को छू रही थी, मैंने कहानी के उस अंश को लाकर फेसबुक पटल पर धर दिया। ऐसा श्रीराम किशोर उपाध्याय के दो कहानी लकी चार्म एवं आखिरी एसएमएस के साथ हुआ। अब आप ऐसे ही समझ सकते हैं कि कहानी संग्रह की कहानियाँ बहुत ही दमदार हैं।”
दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। उपस्थित रचनाकारों ने विविध विषयों पर सृजित सुंदर – सरस रचनाओं का काव्य पाठ करके वातावरण को आनंदमय बना दिया। सुश्री शिल्पी भटनागर (संगोष्ठी संयोजिका) तृप्ति मिश्रा (सह संयोजिका) डॉ राशि सिन्हा (बोकारो) डॉ रमा द्विवेदी, रामकिशोर उपाध्याय, प्रियंका पाण्डे, दर्शन सिंह, भावना पुरोहित (मीडिया प्रभारी) कवयित्री प्रमिला पाण्डेय (कानपुर) डॉ संगीता शर्मा (मीडिया प्रभारी) सुरज कुमारी गोस्वामी, स्वाति बचुलकर देशपांडे, शकुंतला मिश्रा, मोहिनी गुप्ता दर्शन सिंह ने काव्यपाठ किया। राजेश सिंह ‘श्रेयस’ (लखनऊ) ने अध्यक्षीय प्रतिक्रिया में कहा कि आज की संगोष्ठी बहुत सफल और सार्थक रही। सभी रचनाकारों की विविध रस सम्पृक्त रचनाओं में नवगीत, मुक्तक, कविता, क्षणिका एवं हास्य – व्यंग्य काव्य की प्रस्तुति ने सुन्दर समां- सा बाँध दिया। उन्होंने सभी को बधाई और आयोजकों को शुभकामनाएं दीं और अध्यक्षीय काव्य पाठ किया। रश्मि तिवारीने तकनीकी सहयोग दिया।
डॉ सुषमा देवी, सरिता दीक्षित, डॉ स्वाति गुप्ता, डॉ ममता श्रीवास्तवा सरुनाथ (दिल्ली) प्रिया एम, राजेंद्र कुमार, विनय विक्रम सिंह (दिल्ली) सविता सौरभ (बनारस) ने कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज की। प्रथम सत्र का संचालन शिल्पी भटनागर (संगोष्ठी संयोजिका) एवं द्वितीय सत्र का संचालन तृप्ति मिश्रा (सह संयोजिका) ने किया एवं प्रियंका पाण्डे के आभार प्रदर्शन से कार्यक्रम समाप्त हुआ।
