हैदराबाद/लखनऊ : 8 फरवरी को अथर्व इंडिया अंतरराष्ट्रीय शोध संस्थान, लखनऊ के तत्वावधान में महाभारत के प्रमुख पात्र विषय पर चिंतन/शोधपूर्ण अभिव्यक्ति कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में देश के अनेक प्रतिभागियों ने अपने-अपने मन पसंद पात्रों पर अपनी गहन चिंतनपरक विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन संस्थान की विदुषी निदेशिका अनीशा कुमारी ने किया। वक्ताओं पर उचित टिप्पणी संस्थान के प्रबंध निदेशक डॉ वी बी पाण्डेय की रही तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ जयप्रकाश तिवारी ने की।

कार्यक्रम के प्रथम पात्र “अर्जुन” पर बिहार के शिक्षक वक्ता आशीष अम्बर ने अपनी प्रस्तुति दी तथा अंतिम चरित्र महाभारत के महानायक “भगवान श्रीकृष्ण” पर ऊषा कंसल ने उत्कृष्ट प्रस्तुति दी। मध्य क्रम में शांतनु (मृत्युंजय त्रिपाठी), गंगा (कृष्ण कुमार पाठक), भीष्म (डॉ. मनोरमा सिंह “अंशु”), धृतराष्ट्र (अंजलि देवान), गांधारी (डॉ. वीणा वादिनी), वेदव्यास (पूजा श्रीवास्ता), दुष्यंत (दीप्ति कार्की), शकुंतला (प्रो. सीमा सरकार), गंगा (कृष्ण कुमार पाठक) देवकी (डॉ. रीमा छावड़ा), युधिष्ठिर (स्मृति चंदेल), द्रौपदी (दीप्तांशु गौतम), विदुर (डॉ. पिंकी श्रीवास्तव), कर्ण (डॉ. अंकित कुमार जैन), शिखंडी (रश्मि गुप्ता), हिडिंबा (मिलन चौहान), घटोत्कच (सुप्रीति चावला), अश्वत्थामा ( हेम कुमार गहतोड़ी), राधा (श्वेता श्रीवास्तव) और शुक्राचार्य (मोहाना) ने सुंदर प्रस्तुति दी। भीष्म, शकुंतला, शांतनु, देवकी, द्रौपदी आदि चरित्रों पर शोधपूर्ण अभिव्यक्ति रही।

प्रतिभागियों द्वारा पात्रों पर कुछ नए नए प्रश्न भी उठाए गए। जैसे- डॉ रीमा छावड़ा ने रोहिणी की कोख में गर्भ स्थानांतरण का प्रश्न उठाया, (जिसे निदेशक डॉ वी बी पाण्डेय ने टिप्पणी के लिए कार्यक्रम अध्यक्ष को समर्पित कर दिया)। कार्यक्रम अध्यक्ष ने छांदोग्य उपनिषद में वर्णित पंचाग्नि विद्या से तथा वीर्य शोधन प्रक्रिया, युक्ताहार बिहार, भोग्य, भोक्ता सिद्धांत से इसे समझाया तथा विदुर प्रकरण में कैसे विदुर के माध्यम से “सनतसुजातियम” नामक एक अत्यंत उत्कृष्ट ग्रंथ भी अस्तित्व में आया, इसका उल्लेख किया।
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ज्ञातव्य है कि महाभारत के केवल तीन ऐसे महत्वपूर्ण संदर्भ हैं जिसका भाष्य आदि शंकराचार्य जी ने किया है- (i) श्रीमद्भगवद्गीता, (ii) विष्णुसहस्रनाम (iii) सनतसुजाति। यह संवाद बहुत उपयोगी रही, कुछ वार्ताएं सिद्धांत वृत्ति युक्त रहीं तो कुछ सामान्य कोटि की। हालांकि, सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि वर्तमान पाश्चात्य सभ्यता संस्कृति के प्रभाव में जहां सनातन संस्कृति की उपेक्षा की जा रही है। वर्तमान पीढ़ी पानी संस्कृति को बहुत कम जानती है। पाश्चात्य कुचक्रों में अर्थ का अनर्थ समझ बैठती है। उस दृष्टि से यह संवाद अत्यंत उपयोगी और सराहनीय है। देश के चिंतक पढ़ रहे हैं। समझ रहे हैं। प्रश्न भी उठा रहे हैं। यह दृष्टि आशावादी है। बहुत संतोषप्रद है। वक्ताओं ने सुझाव दिया कि यदि संस्थान द्वारा एक-एक पात्र का चयन कर उस पर सेमिनार जैसा आयोजन किया जाए, शोधपत्र आमंत्रित किया जाए तो यह बहुत बड़ी सांस्कृतिक सेवा, राष्ट्र सेवा होगी।
वक्ताओं ने आगे कहा कि कृपया इसे सुझाव नहीं, अनुरोध मानकर यह संस्थान इस बिंदु पर विचार करे। कुछ प्रतिभागियों में यह शोध वृत्ति दिखी है, आधा जगाती है। कहा जाता है- “यन्न भारते तन्न भारते” (यत न भारते तत् न भारते)। अर्थात् जो महाभारत ग्रंथ में यदि नहीं है, तो समझी वह भारत में कहीं नहीं है, अरे! सब कुछ है इस महाभारत ग्रंथ में। हमें ढूंढने है, मोती, माणिक्य मिलेंगे। हम ढूंढने की वृत्ति तो जगाएं। यह वृत्ति बहुत कुछ कर सकती है। लगातार कार्यक्रम युवाओं में यह वृत्ति जगाएगी। दीप्तांशु गौतम जैसे युवा प्रतिभागी इसके उदाहरण हैं।
अंत में सभी प्रतिभागियों से विनम्र अनुरोध किया गया है कि प्रतिभाग से पूर्व विषय को पढ़ें, समझें, उस पर प्रश्न, प्रतिपादन करें। लिखें, लिखें को संशोधित करें, बारम्बार करें। आप स्वयं चकित हो जायेंगे अपनी क्षमता पर। जिसे आप पाचन नहीं पर रहे थे। यह संतान जामवंत बनकर उद्घोष कर रहा है “का चुप साध रहा बलवाना”। आप वीरवर हनुमान बनकर अवतरित होइए। समय आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।
