हैदराबाद : साहित्य सेवा समिति की 130वीं मासिक गोष्ठी समिति के अध्यक्ष डॉ दया कृष्ण गोयल व समिति के महामंत्री ममता जायसवाल की उपस्थिति में आयोजित की गई। गोष्ठी के दोनों सत्रों की अध्यक्षता डॉ दया कृष्ण गोयल ने की। गोष्ठी का प्रारंभ डॉ सुषमा देवी के सुमधुर सरस्वती वंदना से हुआ।
डॉ दया कृष्ण गोयल के स्वागत भाषण के उपरांत प्रदीप्त विषय “सफल साहित्य के सृजन की रूपरेखा कैसे बनती हैं” पर विषय प्रवेश करते हुए डॉ सुषमा देवी ने साहित्य लेखन की रूपरेखा को प्रस्तुत किया। विषय के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में प्रसिद्ध व्यंग कार बी. एल. आच्छा ने समुचित दृष्टांतो द्वारा अपने विशद वक्तव्य से यह सिद्ध किया कि सफल साहित्य का सृजन संप्रेषण आत्म गुंजन अनु गुंजन सर्वसाधारण द्वारा गृहीत होने पर कालजयी हो जाता है।
इसी विषय पर डॉ दया कृष्णा गोयल ने सफल साहित्य के सृजन के मुख्य बिंदुओं पर प्रकाश डाला। चर्चा की श्रृंखला को आगे रखते हुए दर्शन सिंह ने विषय के मुख्य अंशों को प्रारूपित किया। ममता जायसवाल, श्रृतिकांत भारती, गिरधारी लाल गुप्ता और बैजनाथ सुनहरे ने विचार श्रृंखला को प्रवर्तित किया।
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गोष्ठी के प्रथम सत्र का संचालन निर्वहन करने के उपरांत डॉक्टर सुपर्णा मुखर्जी ने द्वितीय सत्र काव्य गोष्ठी का भी संचालन भार निर्वाह किया। काव्य गोष्ठी में कवियों ने गजल गीत व्यंग मुक्तक विधाओं में अपनी प्रस्तुतियां दी। उपस्थित कविगण डॉक्टर अर्चना पांडे, शिल्पी भटनागर, बैजनाथ सुनहरे, विनोद गिरि अनोखा, दर्शन सिंह, सी. पी. दायमा, डॉ सुपर्णा मुखर्जी, ममता जायसवाल, दया कृष्ण गोयल, मधु दायमा, सी. परमेश्वरन, गिरधारी लाल गुप्ता, श्रृतिकांत भारती, सुषमा सिंह, उमेश चंद यादव, रेखा वर्मा तृषा आदि रहे। डॉ दया कृष्ण गोयल के अध्यक्षीय भाषण के उपरांत विनोद गिरि अनोखा ने धन्यवाद ज्ञापन द्वारा कार्यक्रम का समापन किया
