न्याय : सुप्रीम कोर्ट से आये दो महत्वपूर्ण फैसले, अन्य की भी हो समीक्षा

सुप्रीम कोर्ट से हाल ही में दो महत्वपूर्ण फैसले आये हैं। पहला- राजद्रोह मामला भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 124-A से जुड़ा है। सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे ने इस धारा को चुनौती देती याचिका दायर की थी। दूसरा- तेलंगाना लागू किये जा रहे पीडी एक्ट है। मेडचल (तेलंगना) पुलिस ने शेयर बाजार में निवेश के नाम पर धोखाधड़ी के आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ पांच मामले दर्ज किए हैं। इन पांच मामलों में उसे जमानत भी मिल गई। लेकिन उसे पीडी एक्ट की धारा 3 के तहत फिर से पुलिस हिरासत में ले लिया। पुलिस कार्रवाई को लेकर उसकी पत्नी ने शुरू में उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।

इन फैसलों की जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है। इस संदर्भ में यह कहना जरूही है कि ऐसे अनेक कानून और नियम हैं जो ब्रिटिश काल में बने है और लागू किये जा रह हैं। साल 2018 में क्रांतिकारी लेखक वरवर राव के अलावा मानवाधिकार कार्यकर्ता वरनॉन गोंज़ाल्विस, अरुण फ़रेरा, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा को भी माओवादियों से संबंधों के आरोप में देश के अलग-अलग इलाकों से गिरफ्तार किया गया। इन आरोपों के तहत ही पुणे के विश्रामबाग पुलिस स्टेशन में वरवरा राव के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 (ए), 505 (1) (B), 117, 120 (B) और गैरकानूनी गतिविधियों की रोकथाम कानून के तहत 13, 16, 17, 18(B), 20, 38, 39, 40 के तहत मामला दर्ज किया है। आज इन धाराओं की भी समीक्षा की जाने की जरूरत है। विश्वास है कि सुप्री कोर्ट ऐसे मामलों को संज्ञान में लेकर अपना फैसला सुनाएगी और केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे कोनून को हटाने का निर्देश देगी।

राजद्रोह

आपको बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने राजद्रोह विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती याचिका पर सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून अंग्रेजों के जमाने का है। अंग्रेज लोग स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए इस कानून का इस्तेमाल करते थे। यह राजद्रोह कानून महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक, भगत सिंह जैसी हस्तियों की आवाज दबाने के लिए इस्तेमाल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि क्या हमें आजादी के 75 साल बाद भी ऐसे कानून की जरूरत है? कोर्ट को चिंता इस कानून के दुरुपयोग को लेकर है। राजद्रोह कानून व्यक्तियों और संस्थानों के लिए गंभीर खतरा है। वैसे तो राजद्रोह मामला भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी की धारा 124-A से जुड़ा है। यह धारा देशद्रोह के मामले में सजा तय करती है। इसके तहत अधिकतम उम्र कैद की सजा का प्रावधान है। सेना के सेवानिवृत्त मेजर जनरल एसजी वोम्बटकेरे ने इस धारा को चुनौती देती याचिका दायर की है। दायर याचिका में उनकी दलील है कि यह धारा बोलने की आजादी पर असर डालती है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी ऐसी ही एक याचिका दायर की है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमणा ने कहा कि सरकार कई कानूनों को खत्म कर रही है। ऐसे समय वह इस राजद्रोह विरोध कानून के बारे में विचार क्यों नहीं कर रही? जब हम कानून के इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं कि इसका खतरनाक इस्तेमाल ठीक उसी तरह हुआ है, जैसे कोई बढ़ई अपनी आरी से किसी एक पेड़ को काटने की बजाय पूरे जंगल को ही काट दे। आईपीसी की धारा 124-A के तहत इतनी शक्तियां मिली हुई हैं कि एक पुलिस अफसर ताश या जुआ खेलने जैसे मामलों में भी किसी के खिलाफ राजद्रोह की धारा लगा सकता है। हालात इतने बिगड़ गये हैं कि अगर कोई सरकार या पार्टी किसी की आवाज न सुनना चाहे तो वह उन लोगों के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल कर लेगी। आम जनता के सामने यही गंभीर सवाल है। केंद्र सरकार अंग्रेजों के दौर के इस कानून को हटा क्यों नहीं देती?

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि इस कानून के प्रावधान को पूरी तरह से रद्द करने की जरूरत नहीं है। हां निश्चित रूप से इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए मानदंड निर्धारित किए जा सकते हैं। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली एक अलग पीठ ने पहले भी इसी तरह की याचिका पर नोटिस जारी किया था। उस मामले की सुनवाई के लिए 27 जुलाई की तारीख तय की गई है। इस मामले को भी उसके साथ जोड़ा जा सकता है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने प्रावधान के दुरुपयोग पर अपनी टिप्पणियां जारी रखीं।

देश की कानून व्यवस्था से जुड़ी रिसर्च करने वाली संस्था आर्टिकल-14 डॉट कॉम की इस साल फरवरी में आई रिपोर्ट में कहती है कि देश में 2010 से 2020 के बीच 11 हजार लोगों के खिलाफ देशद्रोह के 816 मामले दर्ज किये गये हैं हुए। इनमें से 65 फीसदी मामले साल 2014 के बाद दर्ज किये गये हैं। साल 2018 में विधि आयोग की एक रिपोर्ट में आईपीसी की धारा धारा 124-A पर कुछ बातें कही गई थीं। इसमें सुझाव दिया गया था कि अगर कानून व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने और सरकार को हिंसक या गैरकानूनी तरीके से हटाने की नीयत से कोई गतिविधि हुई हो, तभी इस धारा का इस्तेमाल होना चाहिए।

पीडी एक्ट

इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना में पीडी एक्ट के अमलवारी किये जाने के तौर तरीके पर हैरानगी जताई है। तेलंगाना में पीडी एक्ट के लागू किये जाने के तरीके की कड़ी आलोचना की है। आम धारणा बनी है कि पीडी एक्ट टीआरएस सरकार के लिए वरदान बन गया है।
कोई भी किसी बात को लेकर सवाल करे या छोटे-मोटे पांच मामले हो तो नोटिस दिये बिना एक साल तक जेल में रखने के लिए पीडी एक्ट का इस्तेमाल कियाजा रहा है। इसके चलते तेलंगाना पुलिस विभाग पर पीडी एक्ट का दुरुपयोग करने का आरोप है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान पीडी एक्ट पर आश्चर्य व्यक्त किया है।

मेडचल पुलिस ने शेयर बाजार में निवेश के नाम पर धोखाधड़ी के आरोप में एक व्यक्ति के खिलाफ पांच मामले दर्ज किए हैं। इन पांच मामलों में उसे जमानत भी मिल गई। लेकिन उसे पीडी एक्ट की धारा 3 के तहत फिर से पुलिस हिरासत में ले लिया। पुलिस कार्रवाई को लेकर उसकी पत्नी ने शुरू में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लेकिन उस फैसले से वह संतुष्ट नहीं हुई। उसने हाईकोर्ट के फैसले और पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई की। तेलंगाना पुलिस द्वारा पीडी एक्ट को लागू किये जाने के तरीका देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। कोर्ट ने सुनवाई को दौरान पीडी एक्ट को सबसे क्रूर बताया। तेलंगाना में अब तक इस कानून को किसी की ओर से चुनौती नहीं देने पर आश्यर्य व्यक्त किया है। साथ ही खंडपीठ ने सवाल किया कि एक जमानत पर आये व्यक्ति को फिर से हिरासत में कैसे लेते है? कोर्ट ने तेलंगाना सरकार को एक सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया। उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट से भविष्य में भी इस तरह के फैसले आते रहेंगे। ताकि आम लोगों के साथ अन्याय न हो और अदालतों पर विश्वास कायम रहे।

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