सूत्रधार संस्था की गोष्ठी में मातृभाषा के महत्व पर हुई गहन परिचर्चा, इन वक्ताओं ने दिया संदेश

हैदराबाद (सरिता सुराणा की रिपोर्ट) : सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, हैदराबाद, भारत द्वारा 62 वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। संस्थापिका सरिता सुराणा ने सभी सम्मानित सदस्यों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया और वरिष्ठ साहित्यकार चन्द्र प्रकाश दायमा को गोष्ठी की अध्यक्षता करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया। श्रीमती शुभ्रा मोहन्तो ने बहुत ही मधुर स्वर में सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की- जय-जय हे भगवती सुर भारती/तव चरणाम् प्रणमामि।

यह गोष्ठी दो सत्रों में आयोजित की गई थी। प्रथम सत्र में विषय प्रवर्तन करते हुए सरिता सुराणा ने कहा कि हमारा देश बहुभाषी देश है। जनगणना विश्लेषण के अनुसार हमारे देश में लगभग 121 भाषाएं और 19500 से अधिक बोलियां बोली जाती हैं। हमारे संविधान में 22 भाषाओं को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। यूनेस्को ने 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की घोषणा इसलिए की है, जिससे विलुप्त होती सभी भाषाओं को बचाया जा सके।

दर्शन सिंह ने कहा कि बांग्लादेश में बांग्ला भाषा को मान्यता देने हेतु आंदोलन किया गया था और उसी आंदोलन में शहीद हुए लोगों की याद में यह दिन मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। अमिता श्रीवास्तव ने कहा कि हमें अब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सरकार पर दबाव डालना चाहिए। हैदराबाद वासी अच्छी हिन्दी बोलते हैं लेकिन हम उतनी अच्छी तेलुगू नहीं सीख पाए। अगर हम स्थानीय भाषा सीखते हैं तभी यहां की संस्कृति को समझ पाएंगे। वरिष्ठ पत्रकार राजन्ना ने कहा कि हमें सभी भाषाओं का सम्मान करना चाहिए और ज्यादा से ज्यादा भाषाएं सीखनी चाहिए।

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रिमझिम झा ने भगवान शिव और कवि विद्यापति से जुड़ा हुआ रोचक प्रसंग सुनाया। चंद्रप्रकाश दायमा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हम प्रारम्भ से ही मातृभाषा की अनदेखी करके बच्चे को अंग्रेजी भाषा सिखाते हैं। हमारे घर पर मेहमान आने से हम बच्चे को ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार पोएम सुनाने को कहते हैं। कोई भी हिन्दी कविता सुनाने को नहीं कहते। अंग्रेजी सीखें लेकिन मातृभाषा को प्राथमिकता दें। आर्या झा ने कहा कि हमें बोलचाल में मातृभाषा का प्रयोग ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए। प्रथम सत्र की चर्चा बहुत ही सटीक और सारगर्भित रही।

द्वितीय सत्र में उपस्थित सभी सदस्यों ने महाशिवरात्रि पर्व और अन्य विषयों से सम्बन्धित विभिन्न रचनाओं का पाठ किया। शुभ्रा मोहन्तो ने बांग्ला भाषा में रवींद्र संगीत से जुड़े शानदार गीत की प्रस्तुति दी। कटक, उड़ीसा से रिमझिम झा ने मैथिली भाषा में उघना (भगवान शिव) की कथा को बहुत ही सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया। दर्शन सिंह ने पंजाबी भाषा में अपनी रचना प्रस्तुत की, जिसका सन्दर्भ यह था कि हमें कभी-कभी बेवजह भी हंस लेना चाहिए।

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अमिता श्रीवास्तव ने सुन्दर शिव स्तुति का वाचन किया। कोलकाता से हिम्मत चौरड़िया ने राजस्थानी भाषा में है सुरंगो राजस्थान गीत को गाकर के प्रस्तुत किया। आर्या झा ने पति-पत्नी के मधुर सम्बन्धों से सज्जित मनोरम रचना प्रस्तुत की। सरिता सुराणा ने फागुन गीत प्रस्तुत किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में चन्द्र प्रकाश दायमा ने सभी सहभागियों की रचनाओं पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी प्रस्तुत की और मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने अपनी ग़ज़ल के कुछ अशआर यूं प्रस्तुत किए – देशप्रेम की बातें भी अब बेमानी सी क्यों लगती हैं? दोनों आँखें खुली होने पर भी कानी जैसी क्यों लगती है?

तत्पश्चात् संस्था सचिव आर्या झा ने सभी सहभागियों को संस्था के आगामी कार्यक्रमों के बारे में जानकारी दी और सभी का हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने कार्यक्रम का बहुत ही कुशलतापूर्वक संचालन किया। बहुत ही उल्लासमय वातावरण में गोष्ठी सम्पन्न हुई।

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