कादंबिनी क्लब हैदराबाद: 360वीं मासिक गोष्ठी संपन्न, इन साहित्यकारों ने लिया भाग

हैदराबाद: कादंबिनी क्लब हैदराबाद की 360वीं मासिक गोष्ठी का आयोजन कहानीकार शांति अग्रवाल की अध्यक्षता में रविवार को गूगल मीट पर किया गया। प्रेस विज्ञप्ति में जानकारी देते हुए बताया गया कि इस अवसर पर शुभ्रा महंतो द्वारा सरस्वती वंदना से प्रथम सत्र का आरंभ हुआ। साहित्यकार स्वर्गीय डॉक्टर सीता मिश्र को क्लब की ओर से मौन रखकर भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।

क्लब अध्यक्षा डॉक्टर अहिल्या मिश्र ने कहा कि डॉक्टर सीता मिश्रा विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ी हुई थीं और संस्मरण लेखन में विशेष रुचि रखती थीं। सरल, मृदु भाषी एवं संस्कृत भाषा के विद्वान आज हमारे बीच नहीं है। इस क्षति की पूर्ति कदापि नहीं हो सकती।

पटल पर उपस्थित सदस्यों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि डॉक्टर हरिसिंह पाल (साहित्यकार, सदस्य हिन्दी सलाहकार परिषद, सांस्कृतिक मंत्रालय व नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली के मंत्री) मुख्य वक्ता के रूप में आज उपस्थित हैं। ‘सृजनात्मक लेखन के विविध पक्ष’ विषय पर वे अपनी बात रखेंगे और श्रोताओं के प्रश्नों का समाधान भी करेंगे।

संगोष्ठी सत्र संयोजक अवधेश कुमार सिंहा (नई दिल्ली) ने मुख्य वक्ता का परिचय दिया तथा विषय प्रवेश करते हुए कहा कि सृजन बहुत कठिन कार्य है। एक रचनात्मक लेखन होता है और एक सृजनात्मक लेखन होता है। दोनों में क्या फ़र्क है? बर्नाड शॉ ने कहा है कि एक लेखक के लेखन में तीन चीज़ें होनी चाहिए- अनुभव, ऑब्जर्वेशन और इमैजिनेशन। आज आकाशवाणी के पूर्व निदेशक रह चुके डॉक्टर पाल इस संदर्भ में अपनी बात रखेंगे।

डॉक्टर हरिसिंह पाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि सृज़न यानी कोई चीज़ गढ़ना। साहित्य की प्रतिभा होना दैवीय गुण नहीं है। यह व्यक्ति की स्वयं अर्जित शक्ति है। सृजन की आग नहीं जलेगी तो निर्माण होगा ही नहीं। हम मान लेते हैं कि रचना कला है। स्किल डेवलपमेंट है। आचार्यों ने अनेक कलाओं का ज़िक्र किया है। जैसे वास्तुकला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, काव्य कला आदि। नाटक को भी क़ाव्य ही कहा गया है। साहित्य यानी सहित, कल्याणकारी। जो चेतना को उदार व मानवीय बनाएगा वह सृजन कर पाएगा। साहित्य रचना साधना है। तपस्या है। जो मानसिक आवश्यकता की पूर्ति करता है वह साहित्य है। लोकोत्तर आनंद हमारा साहित्य ही दे सकता है। जो साहित्य विघटन की ओर दौड़ता है वह सृजनात्मक सत् साहित्य नहीं है।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। रचना को जातीय/क्षेत्रीय बंधनों में बाधा नहीं जा सकता। व्यंग्य विधा भी प्रमुख विधा है। परंपरा हमारे लेखन का हिस्सा बनती है। आजकल प्रशिक्षण महाविद्यालय अस्तित्व में आ रहे हैं परंतु वे रचनाकार बना नहीं सकते हाँ रचनाकार को तराश अवश्य सकते हैं। सृजनात्मक साहित्य पर एकाधिकार नहीं है। प्रस्तुति मौलिक होनी चाहिए। दलित साहित्य, स्त्री विमर्श, बाल साहित्य, अनुवादित साहित्य आदि विधाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दैवीय प्रेरणा, अनुकरण, स्वछंदतावादी, कलावादी, मनोवैज्ञानिक, यथार्थवादी आदि सिद्धांत को ध्यान में लेना होगा। लेखन अर्थोपार्जन-जीविकोपार्जन में भी सहयोग देता है। यश की प्राप्ति होती है। सृजन में विश्वसनीयता, प्रामाणिकता, स्पष्टता, अनुभव की सत्यता होनी चाहिए।

वक़्तव्य के पश्चात डॉक्टर अहिल्या मिश्र, शिव शंकर अवस्थी, अवधेश कुमार सिन्हा, डॉक्टर पल्लवी पाटिल ने अपनी शंकाओं को रखा तथा समाधान पाया। सत्र का धन्यवाद ज्ञापन अवधेश कुमार सिन्हा ने किया। डॉक्टर रमा द्विवेदी ने साहित्य गरिमा पुरस्कार के आयोजन के संदर्भ में जानकारी देते हुए कहा कि 21 अगस्त 2022 को साहित्यकार डॉक्टर उषा रानी राव बैंगलोर को इस पुरस्कार से नवाज़ा जाएगा। शीघ्र ही स्थान व समय की घोषणा की जाएगी।

कवि गोष्ठी सत्र की अध्यक्षता डॉ शिवशंकर अवस्थी ने की और संचालन श्री प्रवीण प्रणव ने किया। लगभग 46 साहित्यकारों की पटल पर उपस्थिति रही। गीत, ग़ज़ल, कविता, दोहे, हाइकु, बाल कविता आदि का समावेश रचनाकारों ने करते हुए सत्र को सफल बनाया। काव्य पाठ में सुनीता लुल्ला, मीना मुथा, डॉक्टर सुपर्णा मुखर्जी, दीपक दीक्षित, अवधेश कुमार सिन्हा, किरण सिंह, तृप्ति मिश्रा, विनोद गिरि अनोखा, निशी कुमारी, विनीता शर्मा, दर्शन सिंह, डॉक्टर अहिल्या मिश्र, शिल्पी भटनागर, उमादेवी सोनी, प्रवीण प्रणव, डॉक्टर आशा मिश्र ‘मुक्ता’,

प्रोफेसर मधु भंभानी, डॉक्टर पल्लवी पाटिल, डॉक्टर सुषमा देवी, डॉक्टर जे पी बघेल, डॉक्टर रमा द्विवेदी, संतोष रजा, भावना मयूर पुरोहित, डॉ शिवांगी गुप्ता, ने भाग लिया। रश्मि लहर, रवि मिश्रा, शांति अग्रवाल, शहाबुद्दीन शेख़, ब्रजेश पाल, चंद्र प्रकाश दायमा, अमित कुमार, रमाकान्त श्रीवास, मुक्ता कौशिक, डॉ डॉक्टर अर्चना झा, देवा प्रसाद मायला, एपिन सिंह चौहान, सुरभी दत्त, सरिता सुराणा, डॉक्टर रश्मि चौबे, प्रवीण दत्त, अलका चौधरी, रवि मिश्रा, राजीव मिश्रा आदि की उपस्थिति रही।

शिव शंकर अवस्थी ने अध्यक्षीय टिप्पणी में कहा कि सभी ने विभिन्न विषयों पर रचनाएँ प्रस्तुत कीं। हैदराबाद के साथ साथ आज अस्थानीय रचनाकारों से भेंट करते हुए हिंदी साहित्य हेतु चल रही गतिविधियों के लिए उन्होंने साधुवाद दिया। विशेष रूप से संगोष्ठी सत्र में डॉक्टर पाल के उद्बोधन को ज्ञानवर्धक बताया। रचनाकारों की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्हें प्रेरणास्पद मार्गदर्शन दिया तथा अध्यक्षीय काव्य पाठ के साथ अपनी वाणी को विराम दिया। श्रुतिकान्त भारती ने क्लब को साधुवाद दिया।

डॉक्टर आशा मिश्रा ‘मुक्ता’ ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आज पटल पर विगत 21 वर्षों से सर्वाधिक उपस्थिति रही। नए सदस्यों को ग्रूप में जुड़ने का आग्रह किया। क्लब 29वें वर्ष की यात्रा में सभी के साथ सहयोग के कारण ही अपनी गतिविधि निरंतर दे पा रहा है इसका भी ज़िक्र किया गया। मीना मुथा कार्यकारी संयोजिका ने कहा कि अगले माह की गोष्ठी संयुक्त तत्वावधान में 21 अगस्त को होगी। रूबरू आयोजन में सभी सुधी जन अवश्य भाग लें यह अनुरोध किया गया।

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