ताकत: ओबीसी बिल में ऐसा क्या है कि कोई भी पार्टी इससे असहमत नहीं

भारी शोर शराबे और हंगामे के बीच संसद के दोनों सदनों में 127वां संविधान संशोधन बिल-2021 सर्वसम्मति से पास हो गया। इस बिल के क़ानून बन जाने के बाद राज्य सरकारों को ओबीसी यानी अन्य पिछड़ी जातियों की लिस्ट अपने हिसाब से तैयार करने का अधिकार मिल जाएगा और मराठा आरक्षण जैसे मसलों पर राज्य सरकार फ़ैसला लेने के लिए स्वतंत्र होगी।

यूं तो विपक्ष ने संसद के मॉनसून सत्र में जासूसी कांड और कृषि क़ानून को लेकर ख़ूब हंगामा किया, लेकिन ओबीसी से जुड़े बिल का सभी पार्टियों ने समर्थन किया। दरअसल 127वें संविधान संशोधन बिल की आवश्यकता इसलिए पड़ी, क्योंकि 2018 के पहले राज्य और केंद्र सरकार अपनी-अपनी ओबीसी लिस्ट तैयार करते थे। 2018 में संविधान में 102वां संशोधन किया गया, जिसके बाद ओबीसी लिस्ट बनाने का अधिकार केवल केंद्र के पास रह गया।

ऐसे में कुछ महीने पहले मराठा आरक्षण का मुद्दा जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो कोर्ट ने कहा कि ओबीसी लिस्ट तैयार करने का अधिकार राज्यों के पास नहीं है। इसलिए केंद्र को ये संशोधन बिल लाना पड़ा। अब ये बिल दोनों सदनों से पारित हो गया है, जिसके तहत केंद्र के साथ साथ राज्यों को भी अपनी ओबीसी सूची बनाने का अधिकार होगा। इससे क्षेत्रीय पार्टियों के साथ-साथ राष्ट्रीय पार्टियों को भी फ़ायदा होगा क्योंकि कई राज्यों में उनकी भी सरकार है।

एक जमाने में कांग्रेस की जीत के पीछे तीन कारण माने जाते थे- दलित, मुसलमान और ब्राह्मण। ये उनका कोर वोट बैंक था। जब तक ये कांग्रेस के साथ थे, तब तक कांग्रेस राज करती रही, लेकिन जैसे ही ये कोर वोट बैंक छिटका, कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस पर कई किताबें लिख चुके रशीद क़िदवई कहते हैं कांग्रेस ने पिछड़ों की राजनीति कभी नहीं की, लेकिन ओबीसी बिल को समर्थन देने की कांग्रेस की मजबूरी को वो बीजेपी के उदाहरण के ज़रिए समझाते हैं।

रशीद के मुताबिक़ राजनीति में ये आम धारणा है कि बीजेपी को मुसलमानों का वोट नहीं मिलता। लेकिन फिर भी मुसलमानों में महिलाओं को साथ लाने के लिए बीजेपी तीन तलाक़ क़ानून लेकर आई, हज के लिए भी काफ़ी एलान किए। यानी जो साथ नहीं हैं, उनको जोड़ने का प्रयास राजनीतिक दल हमेशा करते हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस ओबीसी वाले संविधान संशोधन बिल का विरोध करती, तो उसका ओबीसी वोट बैंक हाथ से निकल जाता।

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में कांग्रेस के पास भी ओबीसी वोट बैंक है। बिहार और उत्तर प्रदेश में उनके पास ओबीसी वोट नहीं है। रशीद कहते हैं, भले ही कांग्रेस के पास राष्ट्रीय स्तर पर 10 प्रतिशत का वोट शेयर हो, लेकिन वोट बढ़ाने की संभावनाएँ हर पार्टी हमेशा तलाश करती रहती है और कांग्रेस को ओबीसी में वो संभावना दिखती है। एक अनुमान के मुताबिक़ देश में ओबीसी की कुल आबादी 45 से 48 फ़ीसदी है।

यही वजह है कि लोकसभा में बहस के दौरान कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने न सिर्फ़ बिल का समर्थन किया बल्कि 50 फ़ीसदी आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने की मांग तक कर दी। इस समय हर दल पिछड़ी जाति की राजनीति कर रहा है। लगभग आधी आबादी वाले इस वोट बैंक को नज़रअंदाज़ करने का जोखिम कांग्रेस भी नहीं उठाना चाहती। वो कहते हैं कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के पीछे एक अहम कारण ओबीसी वोट बैंक रहा है।

आकड़ों की बात करें तो: साल 2009 से पहले तक बीजेपी के पास 20-22 फ़ीसदी ओबीसी वोटर थे। साल 2014 में ओबीसी वोट 33-34 फ़ीसदी हो गए। साल 2019 में ये और बढ़कर 44 फ़ीसदी हो गए। यही वजह है कि कांग्रेस भी ओबीसी से जुड़े संविधान संशोधन बिल का विरोध नहीं कर सकती है। लेकिन शरद गुप्ता ये नहीं मानते की बीजेपी असल में ओबीसी की सबसे बड़ी हितैषी है।

उनके मुताबिक, “90 के दशक में मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू करने का बीजेपी ने विरोध किया था। उस वक़्त बीजेपी का स्टैंड था कि जाति आधारित आरक्षण की जगह आर्थिक आधार पर आरक्षण होना चाहिए. 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि आरक्षण पर पुनर्विचार होना चाहिए और अब आरएसएस के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले का बयान है। होसबाले ने साफ तौर पर कहा कि वह और उनका संगठन आरएसएस आरक्षण का ‘पुरजोर समर्थक’ हैं। उन्होंने भारत के लिए आरक्षण को एक ‘ऐतिहासिक जरूरत’ बताते हुए कहा जब तक समाज का एक ख़ास वर्ग ‘असमानता’ का अनुभव करता है, तब तक आरक्षण जारी रखा जाना चाहिए। आरएसएस के स्टैंड में आया ये बदलाव विचाराधारा की वजह से नहीं है बल्कि मौकापरस्ती है। अभी उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और उसी के मद्देनज़र बीजेपी चाहती है कि पिछड़े गोलबंद हों।”

उत्तर प्रदेश की बात करें तो वहां ओबीसी वोट 45 फ़ीसदी हैं, जिनमें यादव 10 फ़ीसदी के आसपास हैं। यानी बीजेपी के निशाने पर बाक़ी के 35 फ़ीसदी ओबीसी वोटर हैं। ओबीसी पर केंद्र के संविधान संशोधन बिल का समर्थन बिहार और उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टियों ने भी किया, फिर चाहे वो लालू यादव का राष्ट्रीय जनता दल हो या अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी। इनका दखल उत्तर प्रदेश और बिहार तक ही सीमित है। संविधान संशोधन बिल पर दोनों पार्टियों ने केंद्र सरकार का समर्थन किया और लगे हाथ जातिगत जनगणना की मांग भी कर डाली। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि यादव नेता भले ही संविधान संशोधन बिल का समर्थन कर रहे हो, पर जातिगत जनगणना के पक्ष में बोलते हुए उनके अंदर एक डर भी है।

उनके इस डर के बारे में वो कहते हैं, “जाति जनगणना होने पर यादव नेताओं की राजनीति ख़त्म हो जाएगी जैसे उत्तर भारत में मंडल के बाद सवर्णों की राजनीति (शीर्ष पदों पर) ख़त्म हो गई। ये (यादव नेता) राजनीति करते हुए कहते हैं कि हम सभी पिछड़े वर्गों की राजनीति करते हैं, लेकिन वो ये कभी नहीं कहते कि वो केवल यादवों के नेता है। 1990 के बाद लालू यादव, मुलायम सिंह यादव और नीतीश कुमार जैसे नेता उभरे, ठीक उसी तरह से जातिगत जनगणना के बाद ओबीसी के नए नेता उभर सकते हैं। आरजेडी और समाजवादी पार्टी के नेताओं को यही डर सता रहा है।”

प्रदीप सिंह आगे कहते हैं कि आरजेडी हो या सपा, वो केवल माँग करने के लिए जातिगत जनगणना की माँग कर रहे हैं। उनको पता है कि केंद्र की बीजेपी सरकार इस वक़्त जातिगत जनगणना करवाने या नहीं करवाने के मुद्दे पर अनिश्चितता में है. ऐसे में दोनों पार्टियों को ये सूट करता है कि केंद्र पर दबाव डाला जाए। इससे एक संदेश जाएगा कि बीजेपी ओबीसी के ख़िलाफ़ है। सपा और आरजेडी इस नैरेटिव को बनाए रखने में विश्वास रखते हैं कि केंद्र सरकार ने अब तक ओबीसी के लिए जो क़दम उठाए हैं वो केवल दिखावा है।

शरद गुप्ता भी प्रदीप सिंह की इस बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं। वो कहते हैं, “मंडल कमिशन की रिपोर्ट लागू करवाने में मुलायम सिंह यादव, वीपी सिंह और चंद्रशेखर सबसे आगे थे. फिर धीरे धीरे इनकी राजनीति बदलती गई. पिछड़ों की राजनीति करने की बात तो समाजवादी पार्टी करती है, लेकिन जब एक्शन की बात आती है, पिछड़ों के बजाए केवल यादवों का भला करती नज़र आती है। उत्तर प्रदेश में जब अखिलेश यादव की सरकार थी, उस वक़्त जितनी नियुक्तियाँ (पुलिस हो या शिक्षक) हुईं उनमें यादवों का बोलबाला रहता ही था। उनकी सरकार के बारे में यही परसेप्शन बना हुआ है।”

वो आगे कहते हैं, “जैसे बीजेपी ओबीसी पर मौकापरस्ती की राजनीति कर रही है, वैसे ही समाजवादी पार्टी भी जातिगत जनगणना की माँग केवल दिखावे के लिए ही कर रही है।” ओबीसी पर बीजेपी थोड़ी दुविधा में दिखती है क्योंकि एक तरफ़ तो वो संसद में ओबीसी पर संविधान संशोधन बिल लाती है, ओबीसी समुदाय के 27 नेताओं को मंत्री बनाकर अबकी बार ओबीसी सरकार का नारा बुलंद करती है लेकिन दूसरी तरफ जातिगत जनगणना पर आरएसएस की चुप्पी की वजह से अब तक कोई ठोस फ़ैसला नहीं कर पाई है। (बीबीसी हिन्दी से साभार)

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